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डॉ. शैलेन्द्र कुमार द्वारा लिखित “नामघर : असम की सांस्कृतिक क्रान्ति और शौयर्गाथा” पुस्तक असम के उन पहलुओं को छूती है जिनसे असम से बाहर के लोग लगभग अपरिचित हैं । असम देश के उन गिने-चुने राज्यों में है जो कभी भी मुसलमानों के शासनाधीन नहीं रहे। असम ने देश की तत्कालीन सर्वाधिक शक्तिशाली मुगलिया सल्तनत को अनेक बार पराजित किया। यह अप्रत्याशित कैसे संभव हुआ? असम उन गिनती के राज्यों में है जहां बड़ी संख्या में विदेशी अवैध रूप से आते और बसते रहे, जससे असम की सामाजिक संरचना में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ। वस्तुतः जनसांख्यकीय स्वरूप में ऐसा परिवर्तन शायद ही किसी अन्य राज्य का हुआ हो। इन विदेशियों में बड़ी संख्या में मुसलमान हैं, जो अब वहां की जनसंख्या का एक-तिहाई से भी अधिक ( 34.22 प्रतिशत — जनगणना 2011 ) हैं । इस प्रकार जम्मू-कश्मीर के बाद असम एकमात्र राज्य है जहां मुसलमानों का अनुपात सर्वाधिक है।
ध्यातव्य है कि इतनी विषम और विपरीत पिरिस्थितयों के बावजूद असम का सांस्कृतिक पक्ष सतत जाज्वल्यमान रहा। गीत-संगीत, नृत्य, नाट्य, चत्रकला, स्वभाषा व इतिहास प्रेम आदि में असम सदा अग्रणी रहा। एक ऐसा राज्य जो एक शताब्दी से भी अिधक समय से अनेक तरह के दंश झेलता रहा है, उसका सांस्कृतिक और शैक्षिणिक पक्ष इतना उज्जवल कैसे हो सकता है? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने के लए इस पुस्तक की रचना हुई है। लेखक का मानना है कि असम जो कुछ भी बचा पाया उसके लिए ‘नामघर’ जैसी उदात्त परंपरा उत्तरदायी है। नामघर ने सामाजिक विभेद को समाप्त करके पूरे राज्य में समरसता का संचार किया । इस एकता के कारण ही असम बड़े-से-बड़े युद्धों में विजयी रहा।

पुस्तक में आठ अध्याय हैं। पुस्तक को यात्रा-वृत्तांत शैली में लखा गया है। बहुत थोड़े शब्दों में इस पुस्तक में असम के आठ सौ वर्ष के इतिहास को समेटा गया है। इस पुस्तक को पढ़कर असम के इतिहास से तो परिचित होंगे ही, उन्हें असम के वतर्मान को भी समझने में सहायता मिलेगी।

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नामघर : असम की सांस्कृतिक क्रांति और शौर्यगाथा

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