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परिचय

सभ्यता का अर्थ है एक विचारशील, विकासशील, उदार और सदाशयी मानव समुदाय। इसलिए सभ्यताएं संघर्ष नहीं, संवाद करती हैं। जो संघर्ष करते हैं, वे सभ्य नहीं, असभ्य कहलाते हैं। इस सामान्य परिभाषा को भारत का अनपढ़ और ग्रामीण समाज भी जानता, समझता है। इसलिए वहाँ यदि कोई झगड़ा करे तो उसे जाहिल यानी असभ्य की संज्ञा दे दी जाती है। सभ्यता की इस भारतीय दृष्टि को सामने रख कर ही इस सभ्यता अध्ययन केंद्र की स्थापना की गई है। विश्व के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले सभी मानव समुदायों में संवाद के सूत्रों को तलाशना और उन्हें फिर से स्थापित करना ही हमारा उद्देश्य है।

हमारा यह स्पष्ट मानना है कि अत्यंत प्राचीन काल से ही विश्व में एक वैश्विक व्यवस्था विद्यमान थी जो परस्पर संवाद, सहअस्तित्व और सहयोग पर आधारित थी। इस वैश्विक व्यवस्था का केंद्रबिन्दु भारत था, यह भी इतिहास से साबित होता है। पिछले कुछ सौ वर्षों से वैश्विक व्यवस्था का केंद्रबिंदु भारत से खिसक कर यूरोप की ओर चला गया, और मात्र इन कुछ सौ वर्षों में ही विश्व ने न केवल दो महायुद्ध, और 20-25 करोड़ लोगों का नरसंहार देख लिया, बल्कि प्रकृति तथा पर्यावरण का सत्यानाश हो गया और विश्व विनाश की कगार पर पहुँच गया। स्पष्ट है कि सभ्य और सभ्यता की परिभाषा और स्थापना में गड़बड़ी से ही यह सब विनाश हुआ और हो रहा है। इसलिए आज भी सभ्यताओं के संघर्ष के सिद्धांत गढ़े जा रहे हैं, अनिवार्य संघर्ष की स्थापनाएं दी जा रही हैं।

इस विषम परिस्थिति में यह केंद्र एक प्रयास है संवाद की राह तलाशने का। दुनिया की राजनीति, इतिहास और दर्शन को मौलिक संदर्भों और स्रोतों से देखने और समझने का। वर्तमान समस्याओं को उनके सही परिप्रेक्ष्य में समझने और उनका समाधान तलाशने का। पिछले कई सौ वर्षों में विश्व परिदृश्य में यूरोपीय देशों और उनकी औपनिवेशिक मानसिकता के उभार ने पूरे विश्व के इतिहास और दर्शन को प्रभावित किया है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि यूरोप के लोग केवल कुछ सौ वर्ष पहले तक शेष दुनिया से लगभग अनभिज्ञ थे। उनकी दुनिया भूमध्यसागर के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। इसके परे का पूरा संसार उनके लिए केवल इंडिया ही था। कोलम्बस और वास्को डि गामा के अभियानों के बाद जब उन्हें दुनिया के अन्य देशों का पता चला तो भूख और अभाव के मारे यूरोपीयों ने पहले तो उन सभी देशों को लूटने और वहाँ के सभ्य समुदायों तथा उनकी संस्कृतियों को नष्ट करने का अभियान चलाया। अपनी क्रूरता, बर्बरता तथा धोखाधड़ी से जब उन इलाकों में वे प्रभावी भूमिका में आए तो वहाँ के इतिहास, दर्शन आदि को समझने की कोशिश प्रारंभ की। भौगोलिक दूरी के साथ-साथ सांस्कृतिक तथा सभ्यतागत दूरी के कारण भाषा और परंपरा की समझ के अभाव में वे जितना समझ पाए, उसे ही संपूर्ण बता कर उन्होंने अपने अधूरे ज्ञान को पूरी दुनिया पर थोपने का प्रयास किया। इस क्रम में उन्होंने मौलिक स्रोतों की भरपूर उपेक्षा की, स्थानीय साहित्य के साथ खिलवाड़ किया, नया कुछ गढ़ने की उत्सुकता में पर्याप्त अटकलें लगाईं और अटकलों को प्रमाणित करने के लिए स्वयं द्वारा विकसित आधुनिक विज्ञान का सहारा लिया।

इसका सबसे बड़ा शिकार भारत हुआ, क्योंकि पिछले तीन हजार वर्षों से यूरोप के सपनों में भारत ही दिखता था। भारत की समृद्धि और वैभव के किस्से यूरोप में लोककथाओं की तरह प्रचलित थे। इसलिए भारत के बारे अधिकाधिक जानने की पूरे यूरोप में एक ललक विद्यमान थी। भारत आने वाले प्रारंभिक यूरोपीय यात्रियों में भारत को जानने से अधिक उसके बारे में बताने की अधीरता थी। इसलिए सच-झूठ और मनगढ़ंत किस्सों की यूरोप में बाढ़ आ गई। दुर्भाग्यवश उनके उन्हीं किस्सों को सच मान कर उससे बनी धारणाओं के आधार पर भारत को जानने की कोशिशें की जाने लगीं। यूरोपीयों की अभिजात्य मानसिकता भी उन्हें भारत को हीन साबित करने के लिए प्रेरित कर रही थी। अपनी अभिजात्यता के घमंड में उन्होंने जो कुछ पिछले दो सौ वर्षों में लिखा-पढ़ा, वह चाहे मैकाले जैसे साम्राज्यवादियों का हो या फिर विलियम जोन्स जैसे प्राच्यवादियों का, दोनों ही न तो भारत के समाज तथा सामाजिक व्यवस्थाओं को ठीक से समझ पाते थे और न ही उसे ठीक से प्रकट करते थे। दुर्भाग्यवश उनके लिखे को ही प्रमाण मान कर आज भारत के इतिहास, सामाजिक व्यवस्थाएं, राजनीति आदि पर चिंतन किया जाता है। स्वाभाविक ही है कि इस पद्धति में शिक्षित-दीक्षित लोग यूरोपीय और अमेरिका सरीखे नवयूरोपीय देशों को ही अपना आदर्श मानें।

इन्हीं कारणों से आज यह स्थिति आ गई है कि दुनिया की प्राचीनतम सभ्यता माना जाने वाले अपने देश में किसी भी नीतिनिर्माण के लिए यूरोप और अमेरिका को ही आदर्श माना जाता है। यह मानना आज विकसित मानसिकता का लक्षण माना जाता है कि अपना देश समाज जीवन के सभी आयामों में अत्यंत ही पिछड़ा रहा है और इसलिए यदि हमें आगे बढ़ना है तो पश्चिमी (यूरोपीय और अमेरिकी) मानकों को ही अपनाना होगा। सवाल है कि क्या वास्तव में ऐसा ही है? क्या भारतीय चिंतन और परंपराएं वाकई कालबाह्य और विकासविरोधी हैं? क्या यूरोपीय और अमेरिकी चिंतन वास्तव में मानवहितकारी हैं? शोधपरक दृष्टि डालने से स्थिति इससे एकदम उलटी नजर आती है। वास्तव में यूरो-अमेरिकी चिंतन से मानव और प्रकृति का अहित ही अधिक हुआ है। उनकी शब्दावली, चिंतन, पद्धतियां, रचनाएं आदि सभी किसी न किसी रूप में प्रकृति को बाधित करती हैं। भारतीय शब्दावली, चिंतन, पद्धतियां, रचनाएं आदि सभी मानव तथा प्रकृतिपोषक हैं। दूसरा प्रश्न उठता है कि क्या हम मानव और प्रकृति के लिए हानिकारक चिंतन और रचनाओं को सभ्यता और संस्कृति कह सकते हैं? यदि हाँ तो फिर सभ्य और असभ्य तथा संस्कृति तथा विकृति में अंतर ही क्या हुआ? इसलिए पहली आवश्यकता तो सभ्यता और संस्कृति को ही समझने की है।

सभ्यता अर्थात् क्या?
विश्व का इतिहास पढ़ते समय हम अक्सर सभ्यताओं की चर्चा से दो-चार होते ही हैं। सामान्यतः इतिहास होता भी सभ्यताओं का ही है। सैमुएल हटिंगटन ने जब सभ्यताओं के संघर्ष का अपना सिद्धांत दिया तब दुनिया का ध्यान इस ओर अधिक प्रमुखता से गया है। परंतु भारतीय सनातन दृष्टि से अनभिज्ञ होने के कारण हंट्टिंगटन सभ्यता का अर्थ ही नहीं समझ पाए हैं, ऐसे में उनका सिद्धांत भी संघर्ष को जन्म देने का ही कारण बन रहा है। यूरोप लंबे समय तक सभ्यता की परिभाषा नियत करने की समस्या से जूझता रहा। वहाँ एक समय रोमन और गैररोमन में ही पूरी दुनिया को बाँटा गया था और रोमनों को सभ्य तथा शेष विश्व को असभ्य माना जाता था। आज हम जानते हैं कि वह कोई सही आधार नहीं था। फिर उन्होंने बौद्धिक विकास को सभ्यता का आधार माना। कुछेक यूरोपीय चिंतकों ने आर्थिक विकास को सभ्यता का आधार मान लिया। आज भी सभ्यता की उनकी समझ अस्पष्ट और अधूरी है। इसलिए सभ्यताओं के संघर्ष का उनका सिद्धांत भी सही नहीं है। भारतीय मतानुसार सभ्यता का सामान्य अर्थ होता है समाज के आचार-विचार की सुसंगत और लोकहितकारी व्यवस्था। यह व्यवस्था मनुष्यों के आचार-विचार के निरंतर परिष्कार से बनती है। प्रश्न है कि यदि वाकई सभ्यता आचार-विचार के परिष्कार से पैदा होने वाली एक सकारात्मक वस्तु है तो इनमें संघर्ष क्यों और कैसे हो सकता है? भारतीय मत तो यही है कि सभ्यताओं में संघर्ष नहीं संवाद होता है। संघर्ष असभ्यों में अथवा असभ्यों के कारण होता है। कम से कम भारत की संकल्पना तो यही है।

इन प्रश्नों पर विचार करते समय ध्यान में आता है कि सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के बाद के पश्चिमी विद्वानों ने सभ्यता, संस्कृति और धर्म समेत सभी मौलिक शब्दों की नई परिभाषाएं गढ़ीं। उन परिभाषाओं को सही साबित करने के लिए पूरी दुनिया के इतिहास को मनमर्जी तरीके से लिखा और अपने अल्प ज्ञान व दृष्टि को पूरी दुनिया पर थोपने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए दुनिया को देखने का उनका नजरिया बाइबिल के दायरे में होता था या फिर बाइबिल के विरोध के दायरे में। साथ ही इसमें उनका साम्राज्यवादी दृष्टिकोण भी शामिल रहता था। इसलिए उन्होंने हरेक मानव समुदाय को एक सभ्यता के रूप में परिभाषित कर दिया। अपने दुश्मनों को पहले बर्बर और बाद में पैगन आदि नाम दिए। वस्तुतः सभ्यता की सही परिभाषा में देखा जाए तो यूरोप और अमेरिका जैसे देश आज भी असभ्य ही माने जाएंगे। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम सभ्यता और संस्कृति को सही अर्थों में समझें और भिन्न-भिन्न मानव समुदायों को सभ्यता कहने और मानने की गलती से बचें।

भारतीय दृष्टि ही क्यों?
इसलिए सभ्यता अध्ययन केंद्र का प्रयास यही है कि हम भारतीय दृष्टि से मानव समाज के मुद्दों का अध्ययन करें। सभ्यता, संस्कृति, धर्म आदि शब्दों को भारत की निरपेक्ष वैश्विक तथा व्यापक दृष्टि से समझें। दुर्भाग्यवश आज हम भारत में भी उसी पक्षपाती यूरोपीय दृष्टि से ही विषयों का अध्ययन करते हैं और इसे निरपेक्षता, निष्पक्षता तथा वैज्ञानिकता का नाम भी देते हैं। प्रश्न उठता है कि यदि यूरोपीय दृष्टि से अध्ययन पक्षपातपूर्ण है तो भारतीय दृष्टि से अध्ययन निरपेक्ष कैसे होगा? इसे समझने के लिए हम समय की अवधारणा का उदाहरण ले सकते हैं। हम ग्रीनविच को ही समय का मानक क्यों मानते हैं? इसलिए कि ग्रीनविच से शून्य देशांतर रेखा गुजरती है। इससे पहले उज्जैन ही दुनिया का केंद्र माना जाता था, क्योंकि उज्जैन का अक्षांश और सूर्य की परम क्रांति दोनों ही समान हैं। इसी प्रकार भारत ही विश्व की समस्त सभ्यता और संस्कृतियों का केंद्र तथा मूलस्थान है। विश्व के सभी विचारों, सिद्धांतों, वादों का मूल जन्मस्थान भारत ही है, उसके व्याख्याकार भले ही विभिन्न कालखंडों में विश्व के विभिन्न हिस्सों में होते रहे हों। इसलिए भारतीय दृष्टि से सभ्यताओं का अध्ययन ही वास्तविक वैश्विक, निरपेक्ष तथा निष्पक्ष दृष्टि है। इसलिए भारतीय दृष्टि से अध्ययन करने के बाद भी इसे प्राच्यवादी या भारतवादी, जिसे आज अंग्रेजी में इंडोलोजिस्ट कहा जाता है, कहना गलत होगा।

ऐसा नहीं है कि भारतीय दृष्टि से सभ्यताओं के अध्ययन का यह प्रथम प्रयास है। हमारे पूर्वजों ने ऐसे अनेकविध प्रयास पहले भी किए हैं। उन्होंने बड़ी संख्या में शोध करके पुस्तकें भी लिखी हैं। उन्हें तलाशना, पढ़ना और उनकी परंपरा को आगे बढ़ाना ही इस केंद्र का उद्देश्य है।