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शोध समिति*

1. श्री रवि शंकर

रवि शंकर भारतीय धरोहर पत्रिका के कार्यकारी संपादक और सभ्यता अध्ययन केंद्र नई दिल्ली के शोध निदेशक हैं। राजनीति और समाजशास्त्र के साथ-साथ विज्ञान, धर्म, संस्कृति, दर्शन, योग और अध्यात्म के विषयों में गहरी रूचि और पकड़ है। सभ्यतामूलक अनेक विषयों पर शोध और अध्ययन कर रहे हैं।

मूलतः झारखंड के धनबाद शहर का निवासी हैं। रसायन शास्त्र से बीएससी ऑनर्स किया है। भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। गाँधियन थॉट में स्नातकोत्तर किया है। 1992 में राम मंदिर आंदोलन में सार्वजनिक जीवन से परिचय हुआ। 1994 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से परिचय हुआ और 1995 से 2002 तक सात वर्ष झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में संघ के प्रचारक रहे।

स्वामी जगदीश्वरानंद सरस्वती के मार्गदर्शन में उनके शिष्य आचार्य परमदेव मीमांसक के सान्निध्य में सांगोपोग वेदविद्यापीठ गुरूकुल में संस्कृत का अध्ययन किया। वर्ष 2002 से पत्रकारिता शुरू की। पांचजन्य, हिन्दुस्थान समाचार, भारतीय पक्ष, एकता चक्र, द कंप्लीट विजन, उदय इंडिया, डायलॉग इंडिया आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में काम किया। गाय तथा भारत की परंपरागत कृषि जो आज जैविक कृषि के रूप में जानी जाती है, पर भी शोध किया।  भारतीय ज्ञान-विज्ञान जिसमें आयुर्वेद, कृषि, ज्योतिष आदि शामिल है, पर पिछले 15 वर्षों से अध्ययन, शोध और लेखन कर रहे हैं।

रवि शंकर ने कई पुस्तकें लिखी हैं और संपादित भी की हैं। उनकी पहली पुस्तक है राष्ट्रवादी पत्रकारिता जो माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा प्रकाशित की गई है। उनकी दूसरी पुस्तक भारत में यूरोपीय यात्री: उद्देश्य, वर्णन और यथार्थ है जो प्रभात प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई है। उन्होंने गाय के आर्थिक, वैज्ञानिक, पर्यावरणीय आदि विभिन्न आयामों पर पाँच खंडों के शोध ग्रंथ का संकलन व संपादन किया है। उन्होंने चाणक्य पथ पुस्तक का संपादन और उसमें एक अध्याय का लेखन किया है, जो धरोहर प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है। आयुर्वेद से जुड़ी अनेक पुस्तकों जैसे मानव प्रकृति, आहार-विहार और स्वास्थ्य, आयुर्वेद और कैंसर, पर्व-त्योहार और स्वास्थ्य, का संपादन किया है। आयुर्वेद पर कई शोधपूर्ण आलेख भी लिखे हैं। विभिन्न वैबसाइटों के लिए आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों तथा औषधियों पर आलेखों का संपादन किया है।

कालगणना : मिथक, इतिहास और विज्ञान नामक उनकी एक पुस्तक प्रकाशनाधीन है। उनके अनेक शोधपरक आलेख देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

2. डॉ. विवेक भटनागर
मूलतः उदयपुर राजस्थान के निवासी हैं। बी.एससी., एम.एससी. भौतिक शास्त्र, एम.ए. इतिहास करने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पुरातत्त्व में पीएचडी किया जिसका विषय था पर्यटन के बिना भारत में पुरातत्व।
पांच पुस्तकें लिखी हैं। उदयपुर के संरक्षित स्मारक, इण्डियन मोन्यूमेंट इन ल्यू ऑफ ट्यूरिज्म, ह्यूमन हिस्ट्री इन रेफरेन्स ऑफ जियोग्राफी, भूला-बिसरा योद्धा बप्पा, इकोनोमी ऑफ एंनशिएंट मेवाड़।
समाचार पत्र हिन्दू में सब-एडिटर के पद पर काम किया। इसके बाद ईटीवी में रिसर्च एडिटर के तौर पर काम किया। राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र में रिसर्च एडिटर, रूरल एडिटर, इन्टरनेशन एजेंसी एडिटर और उदयपुर के क्षेत्रीय सम्पादक के तौर पर काम किया। इस दौरान बेस्ट स्पेशल कवरेज फॉर मण्डल टू के लिए झाबरमल्ल सम्मान प्राप्त किया।

3. श्री ऋतेश पाठक
भारतीय सूचना सेवा (आई आई एस) में वरिष्ठ ग्रेड अधिकारी हैं। सभ्यता अध्ययन केंद्र के संस्थापक सदस्य हैं।
गत लगभग 15 वर्षों से पत्रकारिता व संचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। सम्प्रति क्षेत्रीय समाचार एकांश प्रभारी, अकाशवाणी, शिलचर (असम) हैं। पूर्व में यूनीवार्ता, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज, हिन्दुस्थान समाचार, इंडिया न्यूज समेत अनेक संस्थानों में योगदान किया है।
प्रकाशन विभाग (भारत सरकार) की लोकप्रिय विकास संचार पत्रिका योजना (हिंदी) का पांच वर्षों तक संपादन, विभाग से प्रकाशित हिंदी, मैथिली व संस्कृत पुस्तकों का संपादन किया है।
सामाजिक संस्था अखिल भारतीय मिथिला संघ की मैथिली शोध पत्रिका तीरभुक्ति के संपादक। मैथिली व हिंदी में अनेक दस्तावेजों का संपादन किया है।

4. श्री गुंजन अग्रवाल
ग्राम जरीडीह बाज़ार, ज़िला बोकारो, झारखण्ड में जन्मे गुंजन अग्रवाल प्राच्यविद्या, भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म-दर्शन, भारतीय-वाङ्मय, हिंदी-साहित्य, आदि के क्षेत्र में एक जाने-माने हस्ताक्षर हैं। वे भारतीय इतिहास की भ्रांतियों पर विगत कई वर्षों से कार्य कर रहे हैं। विशेषकर पौराणिक कालगणना के आधार पर इन्होंने भारतीय इतिहास का तिथ्यांकन (क्रोनोलॉजी-निर्माण) किया है। वेदों का रचनाकाल, श्रीराम का काल-निर्धारण, श्रीराम की ऐतिहासिकता, रामकथा का विश्वव्यापी प्रसार, महाभारत-युद्ध की तिथि, श्रीकृष्ण का समय, भगवान् बुद्ध का समय, आद्य शंकराचार्य का काल-निर्धारण, भारतीय इतिहास का परम्परागत कालक्रम, भारतीय इतिहास-लेखन, इस्लाम-पूर्व अरब में हिन्दू-संस्कृति, यूरोपीयों द्वारा भारतीय कला और बौद्धिक सम्पदा की लूट, आदि अनेक विषयों में इनके लिखे शोध-पत्रों ने उल्लेखनीय ख्याति अर्जित की है।
गुंजन अग्रवाल का साहित्यिक जीवन पटना से प्रकाशित ‘सनातन भारत’ से प्रारम्भ हुआ। ये ‘सनातन भारत’ (हिंदी-मासिक) में सम्पादक-मण्डल सदस्य; ‘आरोग्य संहिता’ (हिंदी-द्वैमासिक) में उप सम्पादक; ‘पिनाक’ (हिंदी-त्रैमासिक) में प्रबन्ध-सम्पादक; ‘पगडंडी’ (हिंदी-त्रैमासिक) में सम्पादक; ‘इतिहास दर्पण’ (अर्धवार्षिक शोध-पत्रिका) में सह-सम्पादक और पटना की सुप्रतिष्ठित ‘पटना-परिक्रमा’ (हिंदी-वार्षिक पटना बिजनेस डायरेक्टरी) में प्रधान सम्पादक रह चुके हैं। प्राच्यविद्या की सुप्रतिष्ठित हिंदी-मासिकी ‘दी कोर’ के 30 अंकों का सम्पादन किया है। सम्प्रति दिल्ली से प्रकाशित शोध-पत्रिका ‘सभ्यता-संवाद’ में कार्यकारी सम्पादक के पद पर कार्यरत हैं।

गुंजन अग्रवाल बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक रहे हैं। इन्होंने 2004-’05 तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, पटना महानगर के कोषाध्यक्ष; 2006-’09 तक स्वदेशी जागरण मंच, पटना महानगर के सह-विचार मण्डल प्रमुख; 2011-’12 में भारतीय इतिहास संकलन समिति, दक्षिण बिहार के सह-सचिव तथा 2012 से 2016 तक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नयी दिल्ली में शोध-सहायक के रूप में कार्य किया। आप ‘बिहार-हिंदी-साहित्य-सम्मेलन’, पटना के संरक्षक-सदस्य और ‘अखिल भारतीय नवोदित साहित्यकार परिषद्’, काशी के सदस्य हैं।

गुंजन अग्रवाल की अनेक पुस्तकें, शताधिक शोध-निबन्ध एवम् आलेख देश की महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित व विद्वानों द्वारा प्रशंसित हुए हैं। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं : ‘हिंदू इतिहास की स्मरणीय तिथियाँ’ (2006), ‘भगवान् बुद्ध और उनकी इतिहास-सम्मत तिथि’ (2009), ‘महाराजा हेमचन्द्र विक्रमादित्य : एक विस्मृत अग्रदूत’ (2014); उपर्युक्त पुस्तकें देश के ख्यातिलब्ध समीक्षकों द्वारा समीक्षित एवं प्रशंसित हुई हैं। 2008 में इनके द्वारा संपादित महामनीषी ‘डॉ. हरवंशलाल ओबराय रचनावली’ का भी प्रकाशन हुआ है। इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने साहित्य भारती प्रकाशन (पटना), वैदिक पब्लिशर्स (नयी दिल्ली) एवम् अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना (नयी दिल्ली) से प्रकाशित शताधिक पुस्तकों का अनाम सम्पादन किया है।
उन्हें ‘प्रभाश्री ग्रामोदय सेवाश्रम’ द्वारा भारतीय इतिहास एवं संस्कृति की संरक्षा में सतत संलग्नता के लिए ‘प्रभाश्री-सम्मान’ से अलंकृत किया गया है।

5. श्री मधुकर रॉय चौधरी

6. श्री धीप्रज्ञ द्विवेदी

7. डॉ. जयप्रकाश सिंह