B-14, Street No. 13
Village Wazirabad, Delhi-110084
Mon - Sat 8.00 A.M. - 06.00 P.M.
Sunday CLOSED
0
No products in the cart.

गतिविधियां

1. शोध कार्य:
भारत के प्राचीन तथा पारंपरिक ज्ञान और विश्व सभ्यताओं का अनुसंधान करना और उसके आधार पर विज्ञान और समाजशास्त्र की विभिन्न धाराओं को पुनर्परिभाषित और व्याख्यायित करने हेतु शोध कार्य किया जा रहा है। साथ ही आज की समस्याओं को भी इस भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करते हुए उनके भारतीय समाधान ढूंढने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। वर्तमान में केंद्र द्वारा निम्नलिखित विषयों पर कार्य किया जा रहा है।
1.1 इतिहास

1.1.1 भारतवर्ष का इतिहास : इसके तहत भारतवर्ष के इतिहास के गौरवपूर्ण पक्ष को उभारने और सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। भारतवर्ष की पराधीनता के मिथक, राजनीतिक पराजयों के मिथ्यात्व और भारतीय योद्धाओं की वीरताओं, विजय अभियानों तथा शासन-पद्धति पर शोध किया जा रहा है। वर्तमान में केंद्र द्वारा भारतवर्ष के पिछले पांच हजार वर्ष के आर्थिक इतिहास पर शोध किया जा रहा है।

1.1.2 विश्व का इतिहास : भारत के साथ-साथ विश्व के इतिहास का अध्ययन भी काफी महत्वपूर्ण है। विश्व के इतिहास को हम चार भाग में बांट सकते हैं। पहला, यूरोप का इतिहास और दूसरा अमेरिका का इतिहास, तीसरा अफ्रीका का इतिहास और चौथा भारतेतर एशिया का इतिहास। इसमें से वर्तमान में केंद्र द्वारा यूरोप और भारतेतर एशिया के इतिहास पर शोधकार्य जारी है।
विश्व इतिहास का कई दृष्टिकोण से दुनिया में अध्ययन किया जाता है, परंतु अभी तक किसी ने विश्व इतिहास का पारिस्थितिकी के दृष्टिकोण से अध्ययन नहीं किया है। दुनिया के पारिस्थितिकीतंत्र का अध्ययन तो किया जाता है, परंतु इस तंत्र से दुनिया का इतिहास किस प्रकार प्रभावित होता रहा है, इस पर कोई समग्र कार्य अभी उपलब्ध नहीं है। कुछ छिटपुट कार्य हुए हैं, परंतु वे कुछेक क्षेत्र विशेष के अध्ययन तक सीमित हैं। सभ्यता अध्ययन केंद्र पारिस्थितिकीतंत्र के प्रभावों की दृष्टि से दुनिया के इतिहास पर एक शोध प्रारंभ कर रहा है।

1.1.2.1 यूरोप का इतिहासः आज हम यूरोप का वही इतिहास पढ़ते हैं, जो वे अपने बारे में हमें पढ़ाना चाहते हैं। यूरोप के वास्तविक इतिहास का अध्ययन और वह भी गैरयूरोपीय चश्मे से करना काफी रोचक भी है और हैरतअंगेज भी। ईसाइयत के प्रादुर्भाव के पहले के यूरोप और ईसाइयत की सत्ता के फैलने के बाद के यूरोप में काफी कुछ है जो छिपा हुआ है। ईसाइयत ने किस प्रकार यूरोप की वास्तविक संस्कृति को नष्ट किया और फिर वहां अज्ञान का कैसा अंधकार फैलाया, उस अंधकार युग से यूरोपीय लोग कैसे बाहर निकले, वहां से बाहर निकलने के क्रम में उन्होंने दुनिया में कैसी लूट और हिंसाचार मचाया, यह सब विवरण काफी लोमहर्षक है। यूरोपीय यात्रियों के अभियानों पर एक शोध कार्य किया गया है। इस शोध कार्य को महाराजा अग्रसेन विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश की स्वामी विवेकानंद पीठ ने स्वीकृति प्रदान की थी और उसके लिए उसने सभी वित्तीय सहायताएं प्रदान कीं। इस पुस्तक का प्रकाशन विश्वविद्यालय के निर्देश पर प्रतिभा प्रतिष्ठान द्वारा किया गया है।

1.1.2.2 भारततेर एशिया का इतिहास : भारत से इतर एशिया का इतिहास काफी रोचक और प्रेरणास्पद है। इस इतिहास को भी साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने काफी विकृत किया हुआ है। उदाहरण के लिए चंगेज खान के बारे में अच्छे-अच्छे इतिहास के विद्यार्थियों को सही जानकारी नहीं है। चंगेज खान को एक नृशंस हत्यारे, लूटेरे और खानाबदोश के रूप में चित्रित किया जाता है। जबकि वह न केवल दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य का संस्थापक रहा है, बल्कि सिल्क रूट के माध्यम से तकनीकी और व्यापार की क्रांति भी उसने की थी। इस प्राचीन रेशम मार्ग पर एक शोध कार्य जारी है। साथ ही भारत-चीन संबंधों के इतिहास पर एक शोध कार्य प्रगति पर है। इस पर शीघ्र ही एक पुस्तक प्रकाशन के लिए प्रस्तावित है।

1.2 राजनीतिशास्त्र
यदि हम भारत और विश्व के सही इतिहास को समझ लेते हैं तो यह साफ हो जाता है कि राजनीतिशास्त्र का विकास भारत में ही हुआ था। जनोन्मुखी राजनीति के सिद्धांत और व्यवहार दोनों का ही भारत में एक लंबा इतिहास रहा है। चारों वेद, राजर्षि मनु, महर्षि वाल्मिकी, महर्षि वेदव्यास से लेकर मध्यकालीन आचार्य कौटिल्य, शुक्राचार्य आदि और वर्तमान में वैद्य गुरुदत्त, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, रामेश्वर प्रसाद मिश्र, बजरंग मुनि आदि विद्वानों और विचारकों की एक लंबी श्रृंखला है जिन्होंने राजनीतिक चिंतन प्रस्तुत किया है। आज भारत में जो राजनीतिशास्त्र पढ़ाया जाता है, वह केवल यूरोप में पिछले चार से पाँच सौ वर्षों में विकसित हुए राजनीतिशास्त्र का इतिहास और उसके सिद्धांत हैं। उससे राजनीतिशास्त्र की सही समझ विकसित नहीं होती। इसलिए केंद्र ने राजनीतिशास्त्र पर शोध प्रारंभ किया है।

1.3 भूगोल तथा भूगर्भशास्त्र
भूगोलशास्त्र की भी कुछ-कुछ यही दशा है। यदि हम वर्तमान भूगोलशास्त्र के इतिहास को देखें तो यह कठिनाई से दो-सवा दो सौ वर्ष पुराना है। यूरोप में भूगोल का अध्ययन प्रारंभ होने का कारण था बाइबिल की पृथिवी और सृष्टि रचना संबंधी मान्यताओं का भारतीय ज्ञान के आलोक में गलत साबित होना। ऐसे में उन्हें किसी ऐसे आधार की आवश्यकता थी जो बाइबिल की मान्यताओं का विकल्प प्रस्तुत करता और जो उनकी ईसाई मान्यताओं को भी स्थापित करता। इसके लिए ही इस भूगोल तथा भूगर्भशास्त्र का जन्म हुआ। यूरोपीय लोगों का भूगोल ज्ञान पहले केवल भूमध्यसागर तक ही सीमित रहा है। वर्ष 1495 में कोलम्बस के अमेरिकी द्वीपों और वास्को द गामा के भारत पहुँचने के बाद उनका विश्व से सटीक परिचय प्रारंभ हुआ। उससे पहले उन्हें भारत और चीन की अफवाहात्मक जानकारियां ही थीं।
इस यूरोपीय भूगोलशास्त्र पर भूगर्भशास्त्र हावी है जिसका जन्म पृथिवी और सृष्टि को जानने के प्रयास में हुआ। चूँकि पृथिवी की रचना और सृष्टिरचना दोनों ही काफी गंभीर विषय हैं और सामान्य दैनंदिन जीवन से संबंध नहीं रखते, इसका अध्ययन करने वाले सामान्य विद्यार्थियों के लिए इसका कोई उपयोग नहीं होता। विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले बहुत ही कम विद्यार्थी ऐसे होंगे जो सृष्टिरचना के रहस्य को समझने में अपना समय और श्रम लगाना चाहेंगे।
भारत में भूगोलशास्त्र किसी पृथक विधा के रूप में विकसित नहीं हुआ। इसपर भी संस्कृत साहित्य में यह प्रचूर परिमाण में उपलब्ध होता है। सृष्टिरचना तो मनुस्मृति से लेकर महाभारत तक के ग्रंथों में मिलती है। इसके अतिरिक्त जल, मिट्टी, वन, वृक्षों, पशुओं, पक्षियों आदि पर भी गंभीर अध्ययन मिलता है। चट्टानों का एक अद्भुत विज्ञान हमारे शिल्पशास्त्र में प्राप्त होता है। इन सारे विवरणों की विशेषता यह है कि इनका मानव समाज के दैनंदिन जीवन में उपयोग है। यूरोपीय शास्त्रों की भांति ये केवल सृष्टिरचना से जुड़ी अटकलें मात्र नहीं हैं। इसलिए इनका उपयोग और महत्व अधिक है। संस्कृत साहित्य में बिखरे पड़े इस भूगोलशास्त्र के ज्ञान को निकालना और उस पर शोध करना केंद्र की एक महत्वपूर्ण गतिविधि है।

1.4 भारतीय गणित
वर्तमान में देश में जो भी गणित का पाठ्यक्रम है, वह छात्रों के लिए नितांत शुष्क और कठिन माना जाता है। साथ ही यदि हम ध्यान से देखें तो उसमें ईसाई मान्यताओं को भी प्रकारांतर से घुसाया गया है। भारतीय पद्धति से गणित काफी सरल और व्यावहारिक जीवन में उपयोगी हुआ करती थी। यदि हम अंकगणित को छोड़ दें तो आज जो गणित हम पढ़ते हैं, यदि हम नौकरी नहीं करें, तो उसका उपयोग नहीं के बराबर ही होता है। और जिस गणित की भारतीय करीगरों को आवश्यकता पड़ती है, वह कहीं पढ़ाया नहीं जाता। ऐसे में भारतीय गणित परंपरा के आधार पर गणित का पाठ्यक्रम विकसित करने की आवश्यकता है। भारतीय गणित के ग्रंथों का एक भाष्य कोलब्रुक ने उन्नीसवीं शताब्दी में किया था। उसके बाद उस पर कोई काम नहीं हुआ था। कर्नाटक के एक इंजीनियर श्री वेणुगोपाल ने भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त, श्रीधर आदि का अनुवाद करने का सराहनीय प्रयास किया है। उन्होंने दस से अधिक ग्रंथ लिखे हैं, जिनमें से कुछ प्रकाशित हुए हैं और कुछ प्रकाशित किए जाने हैं। केंद्र भारतीय गणित पर किए गए ऐसे सभी प्रयासों को एकत्र कर उनके आधार पर एक समग्र पाठ्यक्रम बनाने का प्रयास कर रहा है।

1.5 एनसीईआरटी समीक्षा 

1.6 समकालीन परिदृश्य व नीतियां