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यह पुस्तक वस्तुतः लेखक की दुमका यात्रा का परिणाम है। इस यात्रा के दौरान उन्हें मलूटी की विश्व-धरोहर देखने का सुअवसर मिला। परंतु जहां वास्तुकारों और मूर्तिकारों की इस अद्भुत कृति को देखकर लेखक को असीमित प्रसन्नता और गर्व की अनुभूति हुई, वहीं मंदिरों की जर्जर अवस्था को देखकर उन्हें बहुत पीड़ा और ग्लानि भी हुई।  इतना ही नहीं, वहाँ आधारभूत संरचना के नाम पर कुछ भी नहीं था। न अच्छी सड़कें हैं, न अच्छे होटल, न रेस्तराँ और न ही बाजार। कुल मिलाकर श्रद्धालुओं के लिए कोई सुविधा नहीं। इस प्रकार लेखक  सोचने पर विवश हुए कि इतने प्रसिद्ध और पवित्र स्थल के साथ इतना दुर्व्यवहार क्यों हो रहा है? यह प्रश्न लेखक के मन में बैठ गया। इससे थोड़ी ही अच्छी स्थिति बासुकिनाथधाम की थी और लगभग वैसी ही छिन्नमस्तिका देवी मंदिर की। इन तीनों महत्वपूर्ण स्थानों की तुलना में दुमका से सटे हुए बंगाल के हिस्से में तारादेवी के मंदिर के आसपास इतनी अधिक आधुनिक सुविधाएँ हैं कि लगता है जैसे झारखंड आज भी आदिम युग से बाहर नहीं निकल पाया है।  अतिप्रसिद्ध होने के कारण एकमात्र तीर्थस्थान देवघर का बैद्यनाथधाम है, जहाँ चीजें थोड़ी व्यवस्थित हैं। फिर भी वहाँ की स्थिति भी आदर्श नहीं कही जा सकती। सामान्यतः झारखंड की सड़कें भी अच्छी नहीं हैं। वैसे भी लेखक को सर्वत्र सड़क निर्माण या सड़क मरम्मत का काम होता हुआ दिखा।

लेखक सोचने पर विवश हुए कि झारखंड की ऐसी स्थिति क्यों है? जब अलग राज्य के लिए आंदोलन चल रहा था, तो सबकी यही आशा थी कि अलग राज्य बन जाने के बाद झारखंड का भाग्योदय होगा और यह देश के अग्रणी राज्यों में शामिल होगा। और यह आशा निराधार भी नहीं थी। झारखंड में भरपूर खनिज संपदा थी। झारखंड वाले हिस्से में अनेक आधुनिक और औद्योगिक शहर, यथा राँची, जमशेदपुर, बोकारो, धनबाद आदि थे। धनबाद और मेसरा में जैसे इंजीनियरिंग कॉलेज थे उनके स्तर का एक भी कॉलेज बिहार वाले हिस्से में नहीं था। पर आज लगता है कि सबकी आशाओं पर तुषारापात हो गया है।

झारखंड के कुछ अधिकारियों और सामान्य लोगों से बात करने तथा झारखंड पर उपलब्ध साहित्य का अध्ययन करने के बाद लेखक को पता चला कि झारखंड की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ जमीन की खरीद-बिक्री के लिए एक नहीं, वरन तीन-तीन कानून हैं और यह भी कि ऐसी विचित्र स्थिति देश में कहीं नहीं है। जो जमीन जनजातीय लोगों के अधिकार में है उसे केवल उस थाना क्षेत्र का कोई जनजातीय व्यक्ति ही खरीद सकता है। इस प्रकार कानूनी रूप से जमीन की खरीद-बिक्री लगभग असंभव है। चूँकि जमीन हर प्रकार के विकास की आधारभूत आवश्यकता है, इसलिए झारखंड आने से कोई भी निवेशक, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, हिचकता है। परंतु जहाँ वैधानिक रूप से यह काम नहीं हो सकता है, वहीं अवैधानिक रूप से धड़ल्ले से भूमि का हस्तांतरण होता है। स्पष्ट है कि केवल बाहुबली, भू-माफिया, नेता आदि ही यह काम कर पाते हैं। भूमि के साथ ही नक्सलवाद भी एक ऐसी बाधा रही, जिसके फलस्वरूप बाहर के पूँजीपति यहाँ आने से कतराते रहे।

इसलिए लेखक के मन में यह प्रश्न उठा कि यदि ये कानून इतने विभेदकारी और विकास अवरोधक हैं तो फिर सरकार इन्हें समाप्त क्यों नहीं कर देती? इसी प्रश्न के उत्तर की खोज में लेखक को ज्ञात हुआ कि ईसावाद ( ईसाइयत ) की भूमिका अत्यंत संदेहास्पद रही है। वास्तव में चर्च चाहता है कि ये कानून सदैव बने रहें, ताकि झारखंड समाज अनेक भागों में बँटा रहे और चर्च का मतांतरण का काम निर्बाध रूप से चलता रहे। इस प्रकार झारखंड आज उपनिवेशी कानूनों और ईसाइयत के चंगुल में फँसा हुआ है। चर्च झारखंड की शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में हावी है और ये ही वे स्थान हैं, जो मतांतरण के अड्डे होते हैं। शिक्षा के द्वारा चर्च झारखंड की संस्कृति पर आक्रमण भी कर रहा है। चर्च के विद्यालयों से पढ़कर निकलनेवाले छात्र हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी हो जाते हैं, जैसा कि हम केरल और तमिलनाडु में लंबे समय से देख रहे हैं। इसी तरह चर्च द्वारा संचालित अस्पतालों में हिंदुओं और जनजातीय लोगों का मतांतरण किया जाता है। यदि काशतकारी अधिनियम समाप्त हो जाएँगे, तो चर्च की ही तरह कोई भी भूमि खरीद कर विद्यालय और अस्पताल बना लेगा। ऐसे में स्वाभाविक है कि चर्च का महत्व घट जाएगा।  अन्यथा ऐसा क्यों है कि चाहे वह काशतकारी अधिनियम हो या फिर संविधान की पाँचवीं अनुसूची, दोनों को बचाने के लिए सबसे आगे चर्च ही रहता है?  पर प्रश्न उठता है कि क्या मात्र साढ़े चार प्रतिशत आबादी वाले ईसाई झारखंड को इस सीमा तक प्रभावित कर सकते हैं?  चर्च और नक्सलवाद के बीच भी बहुत नैकट्य है। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जहाँ-जहाँ आदिवासियों को ईसाई बनाया गया है वहीं अलगाववादी नक्सल आंदोलन भी चल रहे हैं। प्रश्न उठता है कि आखिर ऐसा क्यों है?

वैसे तो इन प्रश्नों का संबंध झारखंड राज्य से है, परंतु ये प्रश्न संपूर्ण राष्ट्र को प्रभावित करते हैं। इसलिए इन प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है। यह पुस्तक इसी दिशा में एक लघु प्रयास है।

पुस्तक में कुल दस अध्याय हैं। जहाँ आरंभिक तीन अध्याय झारखंड की संस्कृति को समर्पित हैं, वहीं शेष छह में काश्तकारी कानूनों एवं संविधान की पाँचवीं अनुसूची को। अंतिम अध्याय में यह सुझाया गया है कि कैसे इन कानूनों से मुक्त होकर ही झारखंड विकास के पथ पर अग्रसर हो सकेगा।

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