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प्रस्तुत पुस्तक जाति के उद्गम और विकास पर प्रकाश डालती है तथा यह स्थापित करती है कि जाति का वर्तमान स्वरुप अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन तथा ईसाई मिशनरियों की कुचेष्टा से सृजित है। जाति का दानवीकरण मिशनरियों ने केवल इसलिए किया कि वह मतान्तरण में बाधक बन रही थी। यह भी कि भारतीय धार्मिक वाङ्मय, लोक साहित्य और उपलब्ध पुरातात्विक सामग्री में कहीं कोई प्रमाण वर्ण या जाति के वैमनस्य का नहीं मिलता उलटे सौमनस्य व सदभाव के ही दर्शन होते हैं जिसके अनेक प्रमाण व उदाहरण पुस्तक में दिए गए है। यह पुस्तक जाति के संदर्भ में वंशानुगत या पारम्परिक व्यवसाय की बाध्यता तथा पुजारी व राजा की जाति विशेष के होने संबंधी मिथ्या आरोपों को भी सप्रमाण झूठ ठहराती है।

लेखक का दावा है कि प्राचीनतम काल से आधुनिक काल तक  एक भी उदाहरण वर्ण या जाति के आधार पर संघर्ष या कलह का नहीं मिलता। वेद मंत्र बोलने या सुनने को लेकर जीभ काट लेने या कान में पिघला सीसा/ गरम तेल डालने की या फिर ब्राह्मण को मारने पर शूद्र का हाथ या पैर काटने की एक भी घटना नहीं मिलती। वेद, रामायण, महाभारत काल से भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति तक अन्य वर्ण/जाति के साथ शूद्र भी बड़ी संख्या में न केवल शिक्षा लेते रहे हैं बल्कि देते भी रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था व सामरिक व्यवस्था में भी बाकी सब के साथ शूद्रों का महत्वपूर्ण व निर्णायक योगदान रहा है।

पश्चिम में वायक्लिफ, सबरीनोला, हस, हिपेटिया जैसे अनेकानेक वैचारिक विरोधियों को जिन्दा जलाने या यातना भरी मृत्यु देने जैसी एक भी घटना भारत में दीर्घ काल तक रहे हिन्दू शासन में नहीं मिलती जबकि यहाँ सैकड़ों मत-पंथ एक ही समय पर बनते, पनपते और लुप्त भी होते रहे।

पुस्तक एकलव्य व शम्बूक के बहुचर्चित प्रकरणों पर भी नवीन दृष्टिकोण से विचार करती है।

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