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भारत की एकात्मकता और जनजातीय संस्कृति पर संगोष्ठी का आयोजन

सभ्यता अध्ययन केंद्र और वनवासी कल्याण आश्रम  के संयुक्त तत्वाधान में  भारत की एकात्मता तथा जनजातीय संस्कृति पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी नई दिल्ली के बसंत कुंज में  इंटर यूनिवर्सिटी एक्सिलेरेटर सेंटर में आयोजित की गई।

इस संगोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक श्री राजकुमार भाटिया, भारत सरकार के आयुष मंत्रालय में परामर्शदाता डॉ. अशोक वार्ष्णेय, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डॉ. शैलेंद्र कुमार, रांची विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक दिवाकर मिंज, दत्तोपन्त ठेंगड़ी  शोध संस्थान के निदेशक मुकेश मिश्र, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक रामशंकर उरांव, जनजातीय सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक राजकिशोर हांसदा, जे एन यू की प्राध्यापक फिरमी बोडो समेत अपने-अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठित और सम्मानित हस्तियों ने भी हिस्सा लिया।

6 अगस्त को उद्घाटन सत्र में कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री रामचन्द्र खराड़ी, अध्यक्ष-वनवासी कल्याण आश्रम, कर रहे थे। विशिष्ट अतिथि थे डॉ. अशोक वार्ष्णेय, संगठन मंत्री-आरोग्य भारती तथा सलाहकार, आयुष मंत्रालय, एवं डॉ. अविनाश पाण्डेय, निदेशक-आई.यू. ए. सी और निदेशक-सभ्यता अध्ययन केंद्र श्री रवि शंकर।

कार्यक्रम का कुशल संचालन श्री ऋतेश पाठक ने किया जो आईआईएमसी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान के रजिस्टार के पद पर है। कार्यक्रम की शुरूआत हमारी सनातनी परंपरा द्वारा किया गया। जिसमें मंगलाचरण पाठ किया श्री अलंकार शर्मा ने।

सत्र के आरंभ में दीप प्रज्ज्वलन व भगवान बिरसा मुंडा के चित्र को नमन करने के पश्चात डॉ.अविनाश पांडेय ने देश के विभिन्न भागों से इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने आये प्रतिभागियों के स्वागत किया। उन्होंने भारतीय समाज की स्थिति पर चिंतन करते हुए कहा कि हमें जो इतिहास पढ़ाया गया वह हमारे गौरव को प्रकट करने वाला इतिहास नही। यह भारतीयों को असभ्य दिखाने वाला इतिहास है। अंग्रेज़ो ने जो इतिहास पढ़ाया उसके अनुसार आर्य अन्यत्र से आये। जबकि आधुनिक उपागमों नें सिद्ध कर दिया है कि हम सभी यहीं के निवासी हैं।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. वार्ष्णेय ने बताया कि जनजाति वर्ग ने भारत में अंग्रेजों का भरपूर विरोध किया, क्योंकि उन्हें लगता था कि अंग्रेज उनके जल, जंगल और ज़मीन पर कब्जा करते हैं, जिससे अंक अधिकार क्षेत्र प्रभावित हो रहा है। राष्ट्र रक्षा के लिए जनजातीय समाज के योगदान को इतिहास में वह स्थान नही मिला जिसके वे हकदार थे। 2021 में भारत सरकार ने क्रांतिकारी बिरसा मुंडा का जन्मदिन 15 नवंबर को “जनजातीय गौरव” दिवस के रूप में मनाना शुरू किया है।

श्री रवि शंकर, निदेशक सभ्यता अध्ययन केंद्र ने बताया कि उस समय भारत में मूल निवासी शब्द पर बड़ी चर्चा छिड़ी कि भारत के मूल निवासी कौन। विश्व मे जहां केवल ट्राइब्स या आदिवासियों को मूल निवासी माना जाता है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र को बता दिया कि भारत के सभी लोग यहां के मूल निवासी हैं। यह एक ऐतिहासिक षड्यंत्र है जिसमें युगों से पल्लवित परिष्कृत सभ्यता जीवित है उस मानव वर्ग को इधर उधर से आया हुआ बताना अनुचित है। सही बात तो यह है कि जितनी भी जनजातियां है इन्होंने भारत में वनों की और समाज की रक्षा की है। देश की सीमाओं में रह कर इन्होंने देश की रक्षा भी की है। वनों में  रहनेवाले ये लोग सनातन संस्कृति के लोग हैं।

श्री रवि शंकर ने यह भी बताया कि वन बंधुओं के कल्याण के लिए भारत में सबसे बड़ा सामाजिक संगठन “वनवासी कल्याण आश्रम” है जो जनजातीय समाज को शिक्षित और जागरूक कर रहा है। इस काम के लिए वनवासी कल्याण आश्रम 40 हज़ार से अधिक विद्यालय संचालित कर रहा है।

इस अवसर पर वनवासी कल्याण आश्रम की पत्रिका वन बंधु के अगस्त अंक और सभ्यता अध्ययन केंद्र की पत्रिका सभ्यता संवाद का विमोचन भी किया गया।



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