सभ्यता अध्ययन केंद्र – डॉ आनंद वर्धन जी ने विशिष्ट वक्तव्य देते हुए कहा की पाश्चात्य इतिहासविद भारत के महान इतिहास को नकारते है,पाश्चात्य इतिहास उनके राजाओं के पराक्रम का इतिहास है तथा भारत मे भी ऐसे महान योद्धा/राजा हुए है सभ्यता अध्ययन केंद्र को ऐसे क्षत्रियों पर कार्य करना चाहिए जिन्होंने बाहरी आपदाओ से भारत को बचाया, साथ ही उन्होंने सुझाव दिया की भारत की विज्ञान परम्परा आदि पर भी कार्य करना चाहिए। आगे उन्होंने बताया की विश्व की विज्ञान परंपरा मे भारत का क्या योगदान रहा, भारत स्वयं घोषित विश्व गुरु नहीं है बल्कि विश्व ने हमे गुरु माना। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया की फिबोनाची {Fibonacci} के खोजकर्ता लिओनार्दो बोनाची या लिओनार्दो ऑफ पीसा जो बहुत बड़े गणितज्ञ थे उन्होंने स्वयं कहा की मेरे पिता ने मुझे सीरिया भेजा क्योंकि वहाँ भारतीय गणितज्ञ आते थे और यह भारतीय गणित पद्धति है जिसे मैं यहाँ ला रहा हूँ, क्योंकि ये पद्धति उपयोगी है और रोम की पद्धति अनुपयोगी। 12 वी शताब्दी मे स्पेन कहता है गणित का ज्ञान यदि किसी के पास है तो वह भारत है और भारत हमारा शिक्षक है। बैत अल –हिकमाह {बग़दाद का शाही पुस्तकालय} कहता है आर्यभट्ट के ज्ञान के आगे सब कुछ तुच्छ है। परंतु दुखद बात ये है की भारत मे ही यह उनको विस्तार से नहीं पढ़ाया जाता है। हमने कैसे विश्व मानव को प्रभावित किया है इस पर सभ्यता अध्ययन केंद्र को ध्यान देना चाहिए।
आनंद जी आगे सुझाव दिए की सभ्यता अध्ययन केंद्र को गुरुदत्त की रचनाओ पर, काकोरी आंदोलन, बिहार के सांस्कृतिक आंदोलनों पर, देश के मठों के इतिहास पर कार्य करना चाहिए जो हमारी संस्कृति को बचा के रखा है, गेंदा लाल दीक्षित के नेतृत्व मे चला आंदोलन, बालमनोविज्ञान, जातीय व्यवस्था मे अंग्रेजों द्वारा जो भ्रम और दुष्प्रचार फैलाया है उसे दूर करने के लिए केंद्र को काम करने चाहिए जिसके बारे मे पाठ्यक्रमों मे विस्तार से कुछ नहीं है।
तद्पश्चात मुख्य अतिथि प्रो. अमरजीव लोचन जी ने अपने वक्तव्य मे सिविलाइजेशन और सभ्यता के अंतर पर चर्चा की और कहा कि इस विषय पर भारतीय भाषाओं मेंअधिकाधिक शोध किये जाएं और उन्हें जन जन तक पँहुचाया जाए। उन्होंने कहा किभारतीय परंपरा और बौद्ध एवं हिन्दू की भावना के बीच के परस्पर संघर्ष की निराधार प्रचार को खंडित करने की आवश्यकता है, जिसमेंकेंद्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
समारोप सत्र में एकात्म मानवदर्शन के विद्वान डॉ. महेशचंद्र शर्मा जी का अध्यक्षीय उद्वोधन हुआ एवं श्री रविशंकर जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ समाप्त किया गया।
देश में आज सामान्य प्रसव दुर्लभ होता जा रहा है। सिजेरियन यानी पेट चीर कर प्रसव कराना अधिक सहज प्रतीत हो रहा है। प्रश्न उठता है कि सिजेरियन प्रसव का दूरगामी प्रभाव क्या है? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए ही यह मातृत्व स्वास्थ्य सर्वेक्षण किया जा रहा है। इस लिंक पर क्लिक करके गूगल फार्म पर जाएं और अपने उत्तर तथा अनुभव हमसे साझा करें। यह सर्वेक्षण शुद्ध रूप से अकादमिक कार्य हेतु किया जा रहा है। यहाँ आपके द्वारा दी गई जानकारियां सर्वथा गोपनीय रहेंगी और शोध के अतिरिक्त उनका कोई अन्य उपयोग नहीं किया जाएगा।