– प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद एवं यथार्थवाद जिस यथार्थ पर सर्वाधिक बल देते रहे हैं, उस ‘यथार्थ’ के यथा-अर्थ पर बड़ा बौद्धिक विभ्रम है। यथार्थवाद एवं प्रगतिवाद के विरोधी प्रायः उसे भौतिक यथार्थ मानकर उसके बरक्स मिथक, कल्पना, आध्यात्मिक सत्य, सांस्कृतिक-प्रतीकात्मकता, साहित्यिक सत्य आदि को खड़ा करते रहे हैं। परन्तु यह यथार्थ के मार्क्सवादी अर्थ को जाने बिना किया गया विरोध है। मार्क्सवाद क्या है, इसे समझने के लिए यूरोपीय पदावली को समझना आवश्यक है।
देश में आज सामान्य प्रसव दुर्लभ होता जा रहा है। सिजेरियन यानी पेट चीर कर प्रसव कराना अधिक सहज प्रतीत हो रहा है। प्रश्न उठता है कि सिजेरियन प्रसव का दूरगामी प्रभाव क्या है? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए ही यह मातृत्व स्वास्थ्य सर्वेक्षण किया जा रहा है। इस लिंक पर क्लिक करके गूगल फार्म पर जाएं और अपने उत्तर तथा अनुभव हमसे साझा करें। यह सर्वेक्षण शुद्ध रूप से अकादमिक कार्य हेतु किया जा रहा है। यहाँ आपके द्वारा दी गई जानकारियां सर्वथा गोपनीय रहेंगी और शोध के अतिरिक्त उनका कोई अन्य उपयोग नहीं किया जाएगा।