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भारतीय ज्ञान की पुनःस्थापना के लिए बौद्धिक क्षात्रत्व की जागृति ही विकल्प – मा. मोहन भागवत

ऐतिहासिक कालगणना पुस्तक का लोकार्पण संपन्न

नई दिल्ली। भारत की मनीषा और उसके प्रतिहारों के जागरण के लिए बौद्धिक पराक्रम के महती आवश्यकता है। भारतीय ज्ञानलोक को जिसने भी पश्चिम की दासता से मुक्त करने का प्रयास किया उसे हाशिये पर खींच देने का सक्षम प्रयास किया गया। यह आवश्यक नहीं कि बौद्धिक पराक्रम दिखाने वाला किसी परिवार विचार से हो, आवश्यक यह है कि वह भारती के पक्ष में खड़ा होकर अपने शास्त्र का प्रयोग शस्त्र के रूप में करे। इतिहास केवल सूचना मात्र नहीं, वह भूत का वर्तमान से सम्बंध और भविष्य को संवरण को साधन है। आत्मगौरव जगाने का माध्यम है इतिहास। वहीं इतिहास के प्रत्येक स्वरूप का सम्बंध उसके भौगोलिक परिपेक्ष्य से होना चाहिए। यह विषय कांस्टीट्यूशन क्लब में ‘ऐतिहासिक काल गणना-एक भारतीय विवेचन’ पुस्तक का विमोचन के अवसर पर अतिथियों ने यह उद्गार प्रगट किए। इस पुस्तक को रविशंकर ने लिखी है।
पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक डा\. मोहनराव भागवत ने कहा कि मानसिक दासता की बेड़ियों से घिरे समाज के साथ ही विश्व को भारत का परिचय भारत के ही नजरिये से कराने के लिए ‘बौद्धिक क्षत्रियों’ की जरूरत हैं। क्योंकि अब तक इस दिशा में जिसने भी दुस्साहस किया, उसे हाशिये पर डालने का कुत्सित प्रयास हुआ है। उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं कि ये ‘बौद्धिक क्षत्रीय’ संघ या विचार परिवार से ही निकलें, वह कहीं का भी हो। वह भारत का पक्ष लेकर लड़ने वाला हो। वो भारत को उसी के नजर से समझे तथा उसकी परिभाषा मेें समझाए। उन्होंने कहा कि यह परिभाषा वैश्विक है। सारे विश्व के लिए कल्याणकारी है।
भागवत ने कहा कि आक्रान्ताओं ने हमारे संस्कृति और आस्था के केन्द्रों के साथ ही धार्मिक विचारों पर भी ढहाने का कृत्सित प्रयास किया। उन्होंने हमारे दर्शन और मीमांसाओं को दकियानुसी बताकर उनके प्रमाणिक होने के सभी विचारों को ध्वस्त किया। हमारी हजारों वर्षों की शिक्षा और अर्थ व्यवस्था को ध्वस्त किया और अपनी कुव्यवस्था को थोपा। इसलिए प्रमाण के बाद भी अब तक आर्य आक्रमण के उनके सिद्धांत को अब तक स्वीकार किया जा रहा है। हमें स्मृति लोप हुआ है और यह तभी जाएगा, जब आंखों पर पड़ा विदेशी प्रभाव का ये पर्दा हटेगा और भ्रम दूर होगा। हम अपने मूल से सुपरिचित हो। इसके लिए शिक्षा पद्धति में बदलाव लाना होगा। हमें अपना प्रबोधन करना होगा। पूरा ज्ञान प्राप्त करते हुए आत्म साक्षात्कार करना होगा।
इस अवसर पर सम्बोधित करते हुए पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री व लोकसभा सदस्य डा. सत्यपाल सिंह ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत अगर खड़ा करना है तो अपनी आत्मा को पहचानना होगा कि हम क्या हैं? प्रतिभा के साथ पूर्वजों का ज्ञान हमारे पास है। हम इसका ठीक से स्मरण करना होगा। अपनी आंखों से खुद को देखना होगा। हजारों सालों से हमारी बातें स्थिर हैं। अनुभूति व प्रमाण दोनों इसके पक्ष में है।

इस अवसर पर कार्यक्रम अध्यक्ष लातूर के सांसद सुधाकर तुकाराम शृंगारे ने अपने सम्बोधन में कहा कि आज जिस पुस्तक का लोकार्पण है, वह भारत ही नहीं, बल्कि मनुष्य मात्र के इतिहास के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी। अपनी गलतियों से सीखने का माध्यम है इतिहास। अपनी परम्पराओं, अपनी बौद्धिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पूंजी को ठीक से समझने और उसका ठीक ठीक प्रयोग करने का कारक है इतिहास। इन तथ्यों के आलोक में सभ्यता अध्ययन केंद्र का आज का यह अनुष्ठान एक ऐतिहासिक अनुष्ठान कहा जा सकता है। इतिहास को भारतीय दृष्टि से देखना, या यूं कहें कि निरपेक्ष दृष्टि से देखना आज समय की मांग है और इस मांग को पूरा करने में एक बहुत ही सहायक सन्दर्भ आज के विमर्श से उपजता है। शास्त्रसम्मत युगगणना को अपनाने के लिए जो दृष्टि पुस्तक में प्रस्तुत की गयी है, वह वास्तव में प्रसंशनीय ही नहीं, प्रयोजनीय भी है।
पुस्तक पर प्रकाश डालते हुए लेखक रवि शंकर ने कहा कि हम अपने देश की समस्या और उसके निवारण के तरीके को वैश्विक नजरिये से देखते हैं, जबकि इसे भारतीय नजरिये से देखते हुए समाधान निकालने की आवश्यकता है। हमारी सभ्यता को 15-16 हजार सालों में समेट दिया जाता है। जबकि जिन्होंने ग्रंथों का अध्ययन किया है उन्हें पता है कि भारत का इतिहास एक अरब साल से भी अधिक पुराना है। इसको ही आगे बढ़ाने के लिए इस दिशा में पुस्तक के माध्यम से प्रमाणित कोशिश हुई है। विमोचन कार्यक्रम को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. राजकुमार भाटिया ने भी संबोधित किया।



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