B-14, Street No. 13
Village Wazirabad, Delhi-110084
Mon - Sat 8.00 A.M. - 06.00 P.M.
Sunday CLOSED
0
No products in the cart.

कैसे हुआ यूरोप में सनातन संस्कृति का पराभव

मुरारी गुप्ता

यूरोप में भारतीय संस्कृति पर चल रही वेबिनार की दूसरी कड़ी में इस बार यूरोप में भारतीय संस्कृति के पराभव विषय पर वनवासी कल्याण आश्रम के विश्व विभाग प्रमुख मेजर सुरेंद्र नाथ माथुर (से.नि.) ने रुचिपूर्ण ढंग से स्लाइड के माध्यम से पूरी जानकारी दी।

शुरुआत में उन्होंने विभिन्न तथ्यों और प्रमाणों के माध्यम से यह स्थापित किया कि सदियों पहले आज का यूरोप भारतीय सनातन संस्कृति से संबंद्ध था और वहां सनातन परंपराओं का पालन, आज के भारत की तरह ही किया जाता था। उन्होंने बताया कि इस विषय पर अब भारत के बुद्धिजीवी लोग भी गंभीरता से विचार कर रहे हैं। पिछले कई दशक से यूरोप के मूल निवासियों और भारत की संस्थाओं के बीच विभिन्न कार्यक्रमों के आदान-प्रदान के बाद यह धारणा तेजी से मजबूत हुई है कि यूरोप निश्चित ही भारतीय संस्कृति का स्थान रहा है। यूरोप में कई देशों में वहां के अल्पसंख्यक रह गए मूल निवासियों के उत्सवों, परंपराओं और देवी-देवताओं के माध्यम से मेजर माथुर ने यह साबित किया यूरोप में सदियों पहले सनातन परंपरा रही है।

यूरोप में सनातन संस्कृति

यूरोप में सनातन संस्कृति के विभिन्न प्रमाणों की चर्चा करते हुए मेजर माथुर ने बताया कि हंगरी में शाकम्भरी माता उनकी कुल देवी है। इटली में भगवान वृहस्पति का प्राचीन मंदिर है। कैल्ट्स खुद को भगवान परशुराम के वंशज मानते हैं। हालांकि वे राम और कृष्ण को नहीं जानते। यूरोप के मूल निवासियों के प्रमुख आठ पर्वों के नाम संस्कृत में है। दानु को नदी की देवी मानते हैं। इंडोनेशिया में भी दानु को नदी की देवी कहा जाता है।

फिर यूरोप में भारतीय सनातन संस्कृति का पराभव कैसे हुआ?

मेजर माथुर ने बताया कि इसकी शुरुआत रोम के जूलियस सीजर और गॉल देश के बीच युद्ध से हुई। इस युद्ध ने पूरे यूरोप की तत्कालीन सनातन संस्कृति को सबसे ज्यादा प्रभावित किया था।

गॉल पश्चिमी यूरोप का एक ऐतिहासिक और भौगोलिक विशेषण है जो फ्रांस और उसके इर्द गिर्द के प्रदेशों को कहा जाता है। इस नाम का आज कोई देश नहीं है, लेकिन पहली सदी के आसपास इस प्रदेश को गॉल के नाम से ही जानते थे। प्रसिद्ध फ़्रांसीसी राष्ट्रपति चार्ल्स दि गॉल के उपनाम का भी यही मूल था।

इस युद्ध के बारे में जितने भी प्रमाण मिलते हैं, वे सब जूलियस सीजर के पक्ष के लोगों द्वारा लिखे गए हैं। इसलिए दूसरे पक्ष के बारे में तथ्य ढूंढ़ना कठिन कार्य है। मेजर माथुर ने बताया कि जब उन लोगों का संपर्क यूरोपीय देशों के द्विजो (Druids) से हुआ तो उन्होंने उस युद्ध के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

द्विज- मेजर माथुर ने अपने उद्बोधन में बताया कि यूरोपीय देशों में द्विजों का वही स्वरूप है, जो भारत में गुरुओं का है। लेकिन उन्हें भारत जैसी स्वतंत्रता नहीं है।

जूलियस सीजर के आक्रमण के बाद रोमन यूरोप के द्विजों का प्रभाव समाप्त करने के लिए उन्हें चुन चुन कर समाज के सामने मारा गया जिससे उस वक्त के पूरे समाज में दहशत फैल गई थी। धीरे धीरे रोम का साम्राज्य पूरे यूरोप में फैल गया। एक एस्टरिक नामकी कॉमिक पत्रिका में इस युद्ध के बारे में कुछ दिलचस्प जानकारी मिलती है।

क्या द्विज पूरी तरह समाप्त हो गए-

जूलियस सीजर के आक्रमण ने निश्चित ही यूरोप की प्राचीन संस्कृति को भारी नुकसान पहुंचाया था और द्विजों को पीड़ित किया था, लेकिन इसके बाद भी शेष बचे द्विजों ने अपना संघर्ष गुप्त ढंग से जारी रखा। द्विज भूमिगत हो गए। उन्होंने लोगों का नेतृत्व करना जारी रखा। अपने समाज को बचाने के लिए वे चर्च के प्रीस्ट भी बन गए। द्विजों के पुराने मंदिरों को तोड़कर रोमन साम्राज्य ने उनके ऊपर चर्च बना दिए। लेकिन वे उनके मंदिरों को पूरी तरह नष्ट नहीं कर सके। उन चर्चों की नींव पर पुराने प्रमाण आज भी मिलते हैं। जिन चर्चों का निर्माण रोमनों ने करवाया उन पर भी द्विजों ने अपने गुप्त कोड में अंकित कर दिया था ये हमारे मंदिर है। उनके गुप्त कोड को समझना आसान नहीं है। संदेशों का आदान प्रदान करने के लिए गुप्त भाषा का निर्माण किया। इसी गुप्त भाषा पर आधारित एक पुस्तक बहुत चर्चित हुई थी- द विंची कोड। इस पर कई देशों में प्रतिबंध लगा दिया गया।

रून- RUNE (ऋण)

रोमन अत्याचार से पीड़ित द्विजों ने भूमिगत होकर समाज के लिए कार्य करने लगे। उन्होंने अपने लोगों के बीच संदेशों के आदान-प्रदान के लिए एक गुप्त भाषा का निर्माण किया जिसे RUNE (ऋण) या रून कहा जाता था। आज भी दुनियाभर में मैसोन और इल्युमिनेट जैसे संगठन काम करते हैं, जिनसे कई प्रतिष्ठित व्यक्ति जुड़े हुए हैं। इनका नेतृत्व कौन करता है, यह पता कठिन कार्य है। उसी तरह Druids का नेतृत्व आज कौन कर रहा है, यह पता करना भी आसान नहीं है। उन लोगों का जीवन बहुत चुनौतिपूर्ण है। कहा जाता है कि मैसोन ने ही Rune नाम की गुप्त भाषा का निर्माण किया था। चर्चित और विवादास्पद पुस्तक- दा द विंची कोड में इस भाषा के बारे में काफी लिखा गया है।

मेजर माथुर ने इस गुप्त भाषा पर अपने अध्ययन के आधार पर यह स्थापित किया है कि RUNE संस्कृत भाषा का ऋण शब्द है। Druids (द्विजों) ने अपने पूर्वजों द्वारा समाज और संस्कृति को बचाने के लिए किए प्रयासों को समाज के ऊपर एक ऋण समझते हुए इस गुप्त भाषा का निर्माण किया था। यह इतनी कूट भाषा है कि इसे समझना आसान नहीं है। लेकिन रोमन अत्याचारों से बचते हुए अपने समाज के लोगों और अपनी परंपराओं को बचाने के लिए इस भाषा को तैयार किया गया।

मेजर माथुर ने अपने अनुभवों और अध्ययन के आधार पर बताया कैल्ट और दूसरे समूह के लोग भारतीय संस्कृति को अपने बहुत करीब पाते हैं। हालांकि चर्च के आधिपत्य के कारण वे लोग अपने यज्ञ, हवन और दूसरी परंपराओँ का निर्वाहन शहरों से बाहर जंगलों में करते हैं। उन्हें शहरों के भीतर ऐसा करने की अनुमति नहीं है।

आखिर में मेजर माथुर ने इस बात पर जोर दिया कि यूरोप में सनातन संस्कृति को समझने के लिए अभी बहुत संवाद और अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अभी तक जितने प्रमाण मिले हैं, उऩके आधार पर भारत को इस क्षेत्र में पहल करनी चाहिए।

वेबिनार के अंत में प्रश्नोत्तरी सत्र में मेजर माथुर ने सहभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया।

 



Leave a Reply