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सार्वभौम तथा चक्रवर्ती सम्राट ललितादित्य पर एकदिवसीय संगोष्ठी

विगत 14 सितंबर, 2019 दिन शनिवार को सभ्यता अध्ययन केंद्र तथा जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वाधान में भारतीय अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर),नई दिल्ली में “विश्वविजेता सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड” विषय पर एकदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में देशभर से ललितादित्य और कश्मीर के विषय के अध्येता एकत्र हुए थे।

कश्मीर का आविष्कार है चाय की केतली

सम्राट ललितादित्य के विषय में गहन अध्ययन करने वाले इतिहासविद् तथा सभ्यता अध्ययन केंद्र के शोध सह-निदेशक डॉ. विवेक भटनागरने कहा कि भारतीय इतिहास में सम्राट अशोक के बाद ललितादित्य को सबसे बड़ा सम्राट कहा जाना चाहिए। अशोक ने सबसे पहले टाइल्ड लेक (जैसे जूनागढ़) बनवाए। उसके बाद फिर ललितादित्य ने ही इस तरह की झीलें बनवायी। राजतरंगिनी में कल्हण के अनुसार कश्मीर का शाब्दिक अर्थ होता है – का = पानी और शमीरा = जल को बहाकर खाली किया गया क्षेत्र। उन्होंने कहा कि झेलम नदी के किनारे बीजबेहरा शहर बनाया गया, जिसमें हाइड्रोलिक प्रेशर के जरिए पानी निकालकर नगर में जलापूर्ति की जाती थी। इसे ‘चक्रधारा’ कहा जाता था। डॉ. भटनागर ने साथ ही कहा कि कश्मीर की भारत और विश्व को कई उल्लेखनीय देन हैं जिनके बारे में अन्य स्थानों का होने का विभ्रम फैलाया गया है। उदाहरण के लिए समावारअर्थात्चाय को गर्म रखने वाली केतलीवास्तव में कश्मीर की देन है, लेकिन फर्जी इतिहास में समावार को चीन की खोज बताया गया है। अधिक ठण्ड से भोजन पचाने में कठिनाई होती है, इसके समाधान के लिए खमीर उठाकर रोटी बनाने का तरीका भी कश्मीर में शुरू हुआ।

उन्होंने कहा कि कश्मीर को राज्य की तरह और विषय की तरह पढ़ना होगा।अगर चीन तथा मिडिल-ईस्ट को पढ़ना है, तब भी कश्मीर को पढ़ना होगा। सामरिक दृष्टि से भारत की रक्षा करनी है तो कश्मीर पर अधिकार रखना ही होगा। कश्मीर का महत्व देखते हुए यहाँ से गुजरने वाले रास्ते को 18वीं शताब्दी में ‘सिल्क-रूट’ का नाम दिया गया, जबकि वास्तव में सिल्क रूट कोई रास्ता है ही नहीं।यह एक विशाल क्षेत्र है, एक राज्यक्षेत्र है, व्यापार का केंद्र है। चंगेज़ ख़ान के बाद खलीफा का अस्तित्व शून्य हो गया। गजवा-ए-हिन्द की अवधारणा 702 ई. में एक खलीफा ने दी थी, जिसे आज आतंकवादी संगठन आईएसआईएस खुरासान मॉडल के रूप में अपना रहा है। सिल्क रूट एक कल्चर है। रेशम भारत में चीन से आया, लेकिन रेशम को बुनने का काम तो भारत में ही होता था।

उत्तर से दक्षिण की ओर आकर जीतने वाला पहला और एकमात्र राजा ललितादित्य है। उसने स्थापत्य कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी बहुत उल्लेखनीय कार्य किए। उसने सहिष्णुपुरा मंदिर बनवाया, जिसमें प्रतिदिन एक लाख लोगों के भोजन करने का प्रबंध था (अल-बरूनी)। उसने 840 किलो सोने से मुक्तिकेश्वर की मूर्ति बनवाई। इसके अलावा उसने ऐसी और भी अनेक मूर्तियाँ बनवाईं। ललितादित्य ने स्वयं वैष्णव होते हुए भी शैव और बुद्ध परंपरा को भी उतना ही सम्मान दिया। काशीप्रसाद जायसवाल ने भी लिखा है कि ललितादित्य का योगदान आर्किटैक्चर, साहित्य, संस्कृति, सर्वांगीण विकास के क्षेत्र में बहुत बड़ा है, जिसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

भारत की एकता का संवाहक ललितादित्य

वरिष्ठ पत्रकार जवाहरलाल कौल ने कहा कि आज यह प्रासंगिक प्रश्न है कि ललितादित्य ही क्यों? भारत में चारों ओर जब शक्तिशाली राजवंश बन और टूट रहे थे, ऐसे समय में ललितादित्य का उदय हुआ। भारत के राजाओं की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि उनके राज्य के बाहर क्या हो रहा है, इस बारे में सचेत नहीं रहते थे। मोहम्मद-बिन-कासिम को बगदाद के खलीफाओं ने भारत पर हमला करने भेजा था। राजा दाहिर यह नहीं समझ पाया कि यह अंतरराष्ट्रीय गिरोहबंदी है, उन्होंने भारत के किसी राजा से सहायता भी नहीं मांगी और हार गया। ललितादित्य वैष्णव थे, विष्णु के पूजक थे, लेकिन उन्होंने सुनिश्चित किया कि दूसरे पंथों के साथ कोई झगड़ा नहीं होना चाहिए (इसके पहले यह काम अशोक ने भी किया था)। ललितादित्य एक महान नेता, सैनिक, बुद्धिजीवी तथापूरे देश को राजनैतिक और सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बांधनेवाले दूरद्रष्टा थे। भारत का इतिहास अभी तक भारत की दृष्टि से लिखा ही नहीं गया, इसलिए ललितादित्य का विषय गौण है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रो. रजनीश मिश्र ने कहा कि इतिहास का प्रयोजन है लोगों की स्मृति की रक्षा करना, जो कुछ घटित हुआ है, उसका संरक्षण करना, लेकिन जो इतिहास हमें पढ़ाया गया है, उससे स्मृतिहीनता आयी, जिसे भारत की शिक्षा प्रणाली में प्राथमिक शिक्षा से ही लागू कर दिया गया। इस गलत इतिहास को विस्थापित करने का समय आ गया है। ललितादित्य के इतिहास को प्राथमिक कक्षाओं से ही उचित स्थान मिले, व्यवस्थित पाठ्यक्रम का निर्माण हो और अत्याचारियों को महिमामंडित करने का काम बंद हो। सभी तथ्यों को हम सप्रमाण प्रस्तुत करें। जेएनयू का एक प्रोफेसर विदेशों में भारत के बारे में गलत जानकारी पेश करता है। प्रो. रजनीश मिश्र ने कश्मीर के इतिहास पर संस्कृत में एक पुस्तक दिखाई, जिसकाअनुवाद करने की आवश्यकता है

प्रसिद्ध इतिहासविद् डॉ. भगवान सिंह ने ललितादित्य के विश्वविजयी होने पर प्रश्न खड़ा किया। उन्होंने कहा कि भारत में ललितादित्य (कश्मीर) और यशोवर्मन (मगध) दोनों एक ही कालखंड में महान शासक हुए हैं। उनके बीच के संघर्ष और उसमें ललितादित्य की भूमिका का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। ललितादित्य के 400 साल बाद राजतरंगिणी लिखी गई है। इसलिए वह असंदिग्ध नहीं है। भारत-विरोधी शक्तियों ने हमारे सांस्कृतिक स्रोतों को नष्ट किया। इन दोनों राजाओं का सही मूल्यांकन होना चाहिए।

नालंदा विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के डॉ. मयंक शेखर ने कहा कि राजतरंगिणी (कल्हण) कोई एक ग्रंथ नहीं, बल्कि कई ग्रंथों का समूह है, उसको समझने के लिए उसके कंटेन्ट और भौगोलिक विवरणों को भी समझना पड़ेगा। इतिहास में अभी जो हमें पढ़ाया गया है, वह एकपक्षीय है। ललितपुर में मार्तण्ड सूर्य मंदिर है। ललितादित्य के इतिहास का साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ में सम्यक मूल्यांकन किया जाना अभी शेष है।

हिन्दू कॉलेज के संस्कृत विभाग की डॉ. सोनिया ने कहा कि राजतरंगिणी के चतुर्थ तरंग में कार्कोट-वंश का वर्णन आता है। ललितादित्य ने भूटान, असम, मेघालय को जीता, मेघालय में नृसिंह की मूर्ति स्थापित की, वह भी बिना किसी आलम्ब (आधार) के, हवा में लटकता हुआ।

जम्मू-अध्ययन केंद्र के निदेशक आशुतोष भटनागर का कहना था कि सिंधु नदी भारत में भी लगभग 450 किलोमीटर बहती है लेकिन इसे हमारे इतिहास और स्मृति से लोप कर दिया गया है। (इस सिन्धु के नाम से प्राय: पाकिस्तान का सन्दर्भ दे दिया जाता है)। कश्मीर से जुड़े ऐसे ही अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों और इतिहास को हमारी स्मृति से गायब कर दिया गया है। उन्होंने कहा “अशोक ने समझा था कि जब तक हिंदुकुश पर हमारा शासन नहीं है, तब तक भारत सुरक्षित नहीं है, इसलिए हिंदुकुश पर शासन चाहिए। आज कश्मीर की 1,21,000 किलोमीटर भूमि पाकिस्तान के कब्जे में है, वह वापस मिलनी चाहिए। गिलगिट भी हमें चाहिए। हमें पता होना चाहिए कि पाक अधिकृत कश्मीर के कौन-कौन से शहर हमारे पास होने चाहिए। पीओके एक राजनैतिक नारा है। जब देश खड़ा हो जाता है, तब सरकार को भी खड़ा होना पड़ता है और वही करना पड़ता है जो देश चाहता है। आज देश कश्मीर के ये हिस्से वापस चाहता है।

ललितादित्य पर बनना चाहिए संग्रहालय

भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के सदस्य एवं इतिहासविद् प्रो. दीनबंधु पांडेय ने अपने समापन भाषण में कहा कि केवल ललितादित्य पर हमें एक आर्काइव / म्यूज़ियम बनाने की आवश्यकता है जिससे कि उनके बारे में अज्ञात या गलत रूप में ज्ञात तथ्यों की जानकारी ठीक से हो सके। भ्रामक तथ्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विकिपीडिया में ललितादित्य के बारे में गलत लिखा है। पीड़ शब्द नहीं है, पीड है। मुक्तापीड का अर्थ है, मुकुट, जिसमें हीरे, जवाहरात, इत्यादि जड़े हों। इतिहास निकालने के लिए साहित्य के अन्दर भी जाना पड़ता है; कभी अलंकार, कभी छंद की भी थाह लेनी पड़ती है। ललितादित्य ने लगभग 37 वर्ष राज्य किया, क्या उसने एक भी सिक्का जारी नहीं किया? इन सवालों का जवाब हमें खोजना है। पुराने फोटोग्राफ, सन्दर्भ, इत्यादि से एक प्रतिकृति (रेप्लिका) बना सकते हैं, संग्रहालय बनाने के लिए हमारी प्रतिबद्धता होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि ललितादित्य मुक्तापीड का अर्थ है आकाश में सूर्य की तरह चमकता हुआ। इतिहास लिखते समय क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए, इसके बारे में प्रो. पांडेय ने बहुत विस्तार से बताया और समझाया। उन्होंने कहा कि सिद्ध-मातृका लिपि का एक संस्करण है शारदा लिपि। छठी शताब्दी में गजनी का पहला शासक हिन्दू था, गजनी हमारा राज्य रहा है। गिलगित में भी हिन्दू राजा हुए हैं। इन तथ्यों को खंगालने की जरूरत है।

दीर्घकालिक विमर्श की आवश्यकता

संगोष्ठी का संचालन करते हुए सभ्यता अध्ययन केंद्र के निदेशक रवि शंकर ने कहा कि ललितादित्य का इतिहास वर्तमान भारतीय इतिहास के अनेक प्रचलित मिथकों को तोड़ता है। उदाहरण के लिए कहा जाता है कि भारत ने कभी भी किसी पर आक्रमण नहीं किया, हमने हमेशा केवल अपना बचाव किया है। यह एक महान झूठ है जो कि भारत की विजिगीषु वृत्ति को दबाने और छिपाने के लिए बोला जाता है। सम्राट ललितादित्य ने भारत की परंपरागत सीमाओं से बाहर जाकर लड़ाइयाँ लड़ीं, जीत प्राप्त की और भारत की सीमाओं का विस्तार किया। दूसरा मिथक फैलाया जाता है कि मुसलमान आक्रांता हमेशा राजा दाहिर से लेकर पृथ्वीराज, राणा सांगा आदि भारत के राजाओं को हराते रहे हैं। सम्राट ललितादित्य ने मुस्लिम आक्रांताओं को इस कदर पराजित किया था कि 300 वर्ष तक भारत की ओर आने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। ऐसे अन्यान्य ढेर सारे मिथक हैं, जो सम्राट ललितादित्य के इतिहास के अध्ययन से टूटेंगे। हालाँकि उन्होंने कहा कि विश्व की भारतीय संकल्पना को ध्यान में रखें तो ललितादित्य को विश्वविजेता कहना गलत हो जाएगा, परंतु यूरोपीय आधारों पर उन्हें विश्वविजेता कहना गलत नहीं है। उन्होंने कहा कि सम्राट ललितादित्य पर लंबे विमर्श की आवश्यकता है और इसलिए सभ्यता अध्ययन केंद्र उन पर एक अंतरराष्ट्रीय सेमीनार के आयोजन की योजना बना रहा है।

इस अवसर पर डॉ. भगवान सिंह की पुस्तक ‘महान योद्धा दानवीर राजा जगदेव तथा उनका परमार राजवंश’ का विमोचन प्रो. दीन बन्धु पाण्डेय, प्रसिद्ध अंतरिक्ष विज्ञानी एवं भारतविद् डॉ. ओम प्रकाश पाण्डेय तथा सभ्यता अध्ययन केन्द्र के अध्यक्ष सुबोध कुमार द्वारा किया गया।

इस संगोष्ठी में प्रसिद्ध अंतरिक्ष विज्ञानी तथा भारतविद् डॉ. ओमप्रकाश पांडेय, दिल्ली विश्वविद्यालय में बिजेनस एंड इकोनोमी के डीन तथा सिल्क रूट विषय के विशेषज्ञ डॉ. वी के कौल, प्रसिद्ध इतिहासविद् डॉ. भगवान सिंह सहित देशभर के अनेक विद्वान उपस्थित थे।