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यूरोप : एक भारतीय दृष्टि पर दोदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला

यूरोप हमें आकर्षित करता है। छुट्टियां मनाने के लिए हमारे नेतागण यूरोप जाना पसंद करते हैं। हमारे नेता हमारे शहरों को यूरोपीय शहर बनाना चाहते हैं, नदियों को यूरोपीय नदियों की भांति साफ करना चाहते हैं। परंतु यह यूरोप की असली छवि नहीं है। यूरोप वास्तव में आज जैसा भी है, उसके वैसा बनने की एक कथा है। यूरोप आज जैसा दिखता है, उसके पीछे का सच भी कुछ और है। उस सच और उस कथा के वाचन के लिए 30-31 जुलाई, 2016 को सभ्यता अध्ययन केंद्र ने भोपाल के धर्मपाल शोधपीठ के साथ मिल कर एक कार्यशाला का आयोजन किया। देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित इस दो दिवसीय कार्यशाला में कुल 45 प्रतिभागी सम्मिलित हुए।

बिना किसी औपचारिक उद्घाटन के प्रारंभ हुए पहले सत्र में कार्यशाला की प्रमुख वक्ता धर्मपाल शोधपीठ की निदेशक प्रो. कुसुमलता केडिया ने यूरोप की पारिस्थितिकी, जलवायु और इन दोनों के प्रभाव में होने वाली बसावटों के ऊपर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पारिस्थितिकी और जलवायु मानव समाज के अनेक स्वाभावों और प्रकृतियों का निर्माण करती है। पर्वत श्रृंखलाओं, तेज प्रवाह वाली पहाड़ी नदियों, घने एवं अंधकारयुक्त दुर्गम्य जंगलों तथा दलदली जमीनों से भरे यूरोप की विषम पारिस्थितिकी और जलवायु वहां के मानव समाज को बिखर जाने के लिए विवश करती रही है और इसके कारण यूरोप के समाज में कुछ विशिष्ट गुणों का अभाव पैदा हो गया। उदाहरण के लिए विषम परिस्थितियों के कारण वहां लम्बे कालखंड तक सड़कें नहीं हुआ करती थीं। सड़कों के न होने से व्यापार, वित्त और आर्थिक व्यवहार काफी कम हुआ करते थे। मुख्य यूरोप यानी कि इंग्लैंड, फ्रांस, फिनलैंड जैसे इलाके वर्ष के अधिकांश समय अतिशय ठंडे होने के कारण जीवन के लिए काफी कष्टसाध्य थे। लोगों को दो जून का भोजन भी अत्यंत कठिनाई से उपलब्ध होता था।

प्रो. केडिया ने अपने पहले ही व्याख्यान में यूरोप से संबंधित अनेक तथ्यों को मिथक साबित कर दिया। यूरोप का प्रारंभ से मांसाहारी होना कठिन था। पशु ही कम होते थे। आम जन को प्रतिदिन मांस उपलब्ध ही नहीं हो पाता था। उनका प्रमुख खाद्य ब्रेड था और वह ब्रेड आज का ब्रेड नहीं था। वह ब्रेड एकदम सूखा हुआ होता था जिसे खाने में मंसूड़ों से खून निकलने लगता है। इसी प्रकार यूरोप के आम जन को घर को गरम रखने की सुविधा भी काफी हाल तक उपलब्ध नहीं थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में जीते, परस्पर झगड़ते, छोटे-छोटे समूहों में गुजर-बसर करते यूरोप में इसलिए शताब्दियों लग गए परंतु किसी राष्ट्र भावना का विकास नहीं हो पाया। आज भी यूरोपीय संघ तो है, परंतु यूरोपीय राष्ट्र नहीं है।

प्रो. केडिया ने नवीनतम शोध-अध्ययनों और पुस्तकों का संदर्भ देते हुए बताया कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध यानी कि पचास, साठ और सत्तर के दशक तक यूरोप के आमजन का जीवन भारत के आमजन के जीवन की तुलना में नारकीय ही कहा जा सकता है। वहां के राजा-महाराजाओं का जीवन भारत के मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन के समान ही रहा है। यह कोई उनकी सादगी के कारण रहा हो, ऐसा नहीं है। प्रो. केडिया ने स्थापित किया कि व्यापार और कृषि दोनों ही यूरोप में अत्यंत थोड़े रहे हैं। इस कारण वहां कपड़ों का अभाव रहा है। कपड़ों के अभाव से सफाई का अभाव रहा है जिसके कारण यूरोप लंबे समय तक बीमारियों का घर रहा है। चर्म रोग, प्लेग, हैजा, संक्रमण से फैलने वाले रोग यूरोप में महामारी के रूप में रहे हैं। शौचालय का अभाव, मृत शरीरों को ठिकाने लाने की व्यवस्था का अभाव आदि भी यूरोप में महामारियां फैलाता रहा है। और ये बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक होता रहा है।

दूसरे सत्र में प्रो. केडिया ने यूरोप की राजनीतिक स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने दिखाया कि किस प्रकार यूरोप की अधिकांश बसावट मध्य एशिया से आए लोगों से हुई है। छोटे-छोटे समूहों में बंटे इन समूहों की राजनीतिक चेतना कैसे विकसित होती रही, इसका उन्होंने विस्तार से किया। ईसाइयत के उदय, उसके अत्याचारों, ज्ञान के अभाव के कारण उत्पन्न उनके मानसिक भयों आदि का वर्णन किसी रहस्योद्घाटन से कम नहीं था। उदाहरण के लिए लंबे समय तक यूरोपीय समुद्र में नहीं जाते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि बाइबिल के अनुसार तो पृथिवी चपटी है, समुद्र में गए तो दूसरी ओर कहीं अनंत में गिर जाएंगे।

कार्यशाला के दूसरे दिन यूरोप में स्त्रियों की स्थिति का वर्णन किया गया। ईसाई चर्च के स्त्रियों पर अत्याचार का अत्यंत रोमहर्षक वर्णन किया। उस अमानवीय अत्याचारों से यूरोपीय स्त्री के संघर्ष और मुक्ति की गाथा करूणा और तेजस्विता का भाव एक साथ पैदा कर रही थी। पैगन आंदोलन, आधुनिक विज्ञान का उदय आदि के कारण यूरोप की बदल रही स्थितियों पर सप्रमाण प्रकाश डाला गया। इसी क्रम में भारत की राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों की भी चर्चा की गई। कार्यशाला के अंतिम सत्र में प्रो. रामेश्वर प्रसाद मिश्र ने कार्यशाला के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस कार्यशाला में बौद्धिक और राजनीतिक मेधासंपन्न लोगों को ही भाग लेना चाहिए। आज देश में प्रचंड बौद्धिक आंदोलन की आवश्यकता है। सर्वत्र जो बौद्धिक विभ्रम व्याप्त है, उसे दूर करने के लिए काफी श्रम करने की आवश्यकता है। कार्यशाला के अध्यक्ष, सनातन संस्था के मार्गदर्शक काकाजी पिंगले का आशीर्वचन भी प्राप्त हुआ। वरिष्ठ पत्रकार और रामजन्मभूमि मामले में हिंदू पक्ष के प्रमुख गवाह रहे राजेंद्र सिंह और गाय तथा वेदों के प्रसिद्ध विद्वान सुबोध कुमार जी का सान्निध्य भी कार्यशाला में प्राप्त हुआ।