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जातीय सद्भाव : भूत, वर्तमान, भविष्य पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी

गत 22 दिसम्बर, 2018 दिन शनिवार को नई दिल्ली के झंडेवालान एक्सटेंशन स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के सभागार में सेंटर फॉर सिविलिजेशनल स्टडीज, दिल्ली द्वारा एकदिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन किया गया। इस सेमीनार का विषय था – जातीय सद्भाव : भूत, वर्तमान, भविष्य। इस सेमीनार में झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, असम आदि राज्यों सहित दिल्ली एनसीआर से लगभग 200 लोगों ने सहभागिता की। इस अवसर पर स्मारिका के रूप में सेंटर फॉर सिविलिजेशनल स्टडीज की त्रैमासिक शोध-पत्रिका ‘सभ्यता-संवाद’ के प्रवेशांक का लोकार्पण भी किया गया।

सेमीनार के मुख्य वक्ता थे मध्य प्रदेश से पधारे विख्यात चिंतक तथा विचारक लेखक प्रो. रामेश्वर प्रसाद मिश्र पंकज। सेमीनार के विशिष्ट अतिथि थे प्रसिद्ध समाजसेवी तथा अर्थवेत्ता  गोपाल कृष्ण अग्रवाल और सेमीनार की अध्यक्षता कर रहे थे, महाराजा अग्रसेन विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश के कुलाधिपति डॉ. नंदकिशोर गर्ग। इनके अलावा इस सेमीनार में वक्ता के नाते उपस्थित थे – वरिष्ठ आईएएस अधिकारी तथा प्रसार भारती के अवर महानिदेशक डॉ. शैलेंद्र कुमार और दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ हैरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट के एसोशिएट प्रोफेसर तथा इतिहास के उद्भट विद्वान डॉ. आनन्द बर्धन और सेंटर फॉर सिविलिजेशनल स्टडीज के अध्यक्ष प्रसिद्ध वेदविद्वान सुबोध कुमार।

सेमीनार में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज करा रहे थे, विख्यात साहित्यकार राजीवरंजन प्रसाद, क्लासिकल इंडियन साइंसेज एंड योग स्टडी सेंटर, गुआहाटी के कुलाध्यक्ष डॉ. मधुकर रायचौधुरी, उदयपुर के वरिष्ठ पत्रकार तथा इतिहासज्ञ डॉ. विवेक भटनागर, महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के रजिस्ट्रार डॉ. सूरज राव, पं. बैजनाथ शर्मा प्राच्य विद्या शोध संस्थान, हाथरस, उत्तर प्रदेश के निदेशक अलंकार शर्मा।

यजुर्वेद के राष्ट्रमंत्र के गायन, दीप प्रज्वलन तथा माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ सेमीनार का शुभारंभ किया गया। इसके बाद मंचस्थ सभी अतिथियों को मेंमेटो तथा पुस्तक भेंट करके उनका स्वागत किया गया। तत्पश्चात् सेंटर के उद्देश्यों और अभी तक की गतिविधियों की जानकारी निदेशक रवि शंकर ने दी। इसके बाद सेंटर की भावी योजनाओं की चर्चा सेंटर के शोध सलाहकार ऋतेश पाठक ने की। इसके बाद सेमीनार के मुख्य विषय जातीय सद्भाव : भूत, वर्तमान, भविष्य पर रवि शंकर ने अपना बीज वक्तव्य रखा। इस बीज वक्तव्य के बाद मुख्य वक्ता प्रो. रामेश्वर प्रसाद मिश्र ने अपना उद्बोधन प्रस्तुत किया। इसके बाद लंच ब्रेक हुआ। सेमीनार के दूसरे सत्र में सेमीनार की स्मारिका के रुप में प्रकाशित सेंटर फ़र सिविलिजेशनल स्टडीज की शोध पत्रिका के प्रवेशांक का लोकार्पण किया गया। उसके बाद बीज वक्तव्य और मुख्य उद्बोधन की पृष्ठभूमि में विषय पर चर्चा प्रारंभ हुई। सभी वक्ताओं के साथ साथ प्रबुद्ध श्रोताओं ने भी इस चर्चा में सक्रिय सहभाग लिया। सेमीनार का समापन ऋग्वेद के संगठन सूक्त के सस्वर गायन के साथ किया गया।

इसका विषय प्रवेश करते हुए केन्द्र के निदेशक रवि शंकर ने कहा कि आज समाज में सर्वत्र केवल जातीय वैमनस्यता की ही बात की जाती है। इसके लिए चाहे हम समानता या फिर समरसता का बहाना लेते हों, परंतु अंततोगत्वा हम यही चर्चा करते हैं, कि समाज में काफी जातीय वैमनस्य रहा है और आज भी है। इसलिए हमें जातियों को समाप्त करना है। यह बात अब छठी-सातवीं के छोटे-छोटे बच्चों को भी एनसीईआरटी की पुस्तकों के माध्यम से पढ़ाई जाने लगी है। इसलिए यहाँ चार प्रश्नों पर चर्चा की जाएगी – जातियाँ देश के लिए वरदान हैं या अभिशाप? क्या जातियों को मिटाया जाना संभव है? भारत में जातीय सद्भाव रहा है या विद्वेष? क्या जातियों में सद्भाव स्थापित किया जा सकता है?

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता तथा प्रसिद्ध लेखक तथा विचारक प्रो. रामेश्वर प्रसाद मिश्र पंकज ने बताया कि जाति शब्द किसी भी धर्मशास्त्र में नहीं है। हालाँकि यह कुलधर्म का हिस्सा है, जो एक स्वाभाविक इकाई है। जातियों की कलह की बात राजनैतिक झूठ है, इसका कोई शास्त्रीय प्रमाण भी नहीं है। प्रो. मिश्र ने अनेक प्रमाण देते हुए बताया कि जातियाँ भारत के लिए कभी भी अभिशाप नहीं रही। उन्होंने जातीय विद्वेष की पृष्ठभूमि को समझाते हुए स्वाधीनता प्राप्ति और उसके बाद देश में बनी राजनीतिक परिस्थितियों का विश्लेषण किया और कहा कि जातियों के बारे में आज जो वातावरण देश में बना है, उसके लिए ये राजनीतिक परिस्थितियां ही जिम्मेदार हैं। वर्तमान राजनीति बाँटो और राज करो के अंग्रेजी सिद्धांत पर अवलंबित है और इसलिए जातियों में संघर्ष के झूठ को स्थापित किया जाता है। गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि जाति के साथ सुरक्षा और प्रगति के सवाल जुड़े हैं, इसलिए हम इसे नकार नहीं सकते हैं।

प्रसार भारती के अवर महानिदेशक डॉ. शैलेंद्र कुमार ने कहा कि आज के समय में जातीय कट्टरता की बात करना बहुत ही बड़ी अज्ञानता है। स्वयं द्वारा किए गए एक शोध का प्रमाण देते हुए उन्होने बताया कि अखबारों में वैवाहिक विज्ञापन देने वाले लोगों में से लगभग साठ प्रतिशत परिवारों के लोग अपनी लड़की के विवाह में जाति बंधन नहीं रखते हैं। लड़कों के परिवारों में यह आँकड़ा और भी ऊपर है। उन्होंने यह भी कहा कि जातियों के कारण ही हमारा अस्तित्व सुरक्षित रहा है। जातीय संरचना के कारण ही देश का मतांतरण होने से बचा। अन्यथा जातीय व्यवस्था से विहीन पूरा मध्य-पूर्व, अफगानिस्तान आदि के क्षेत्रों में इस्लाम पूरी तरह फैल गया था। भारत में वह विफल हुआ तो इसका श्रेय जातीय व्यवस्था को ही है।

प्रो. मिश्र की बातों का समर्थन करते हुए विख्यात अर्थशास्त्री, समाजसेवी तथा भाजपा प्रवक्ता श्री गोपालकृष्ण अग्रवाल ने कहा कि जातियों में संघर्ष की बात वही करते हैं, जिन्होंने भारतीय शास्त्रों तथा समाज का ठीक से अध्ययन नहीं किया होता है। जो लोग मनु स्मृति का विरोध करते हैं, उनमें से शायद ही किसी ने उसका अध्ययन किया होता है। श्री अग्रवाल ने कहा कि वे लंबे समय से साधु-संतों की संगति में रहे हैं और उन्हें यही समझ आया है कि आज जो भी जातीय संघर्ष की घटनाएं देखने के लिए मिलती हैं, वे स्वभाविक नहीं हैं, उनका प्रयासपूर्वक निर्माण किया गया है।

दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ हैरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट के एसोशिएट प्रोफेसर तथा इतिहास के उद्भट विद्वान डॉ. आनन्द बर्धन ने अपने कई निजी अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि जातियां सामाजिक आश्रय प्रदान करती हैं। यह हमारा उत्कर्ष करती हैं, इसीलिए आज समाज का कोई भी वर्ग अपनी जातिधर्मिता नहीं खोना चाहता है। उन्होंने कहा कि जातीय गौरव केवल कथित उच्च जातियों में ही नहीं रहा है, बल्कि यह तथाकथित निम्न वर्गों में भी उतने ही परिमाण में रहा है। मौजूदा समाज में तथाकथित ऊँची-नीची जातियोंके पास अपने गौरव और ग्लानि दोनों के प्रमाण हैं। इसीलिए जातियों को मिटाया जाना संभव नहीं है। उन्होंने पौराणिक काल से लेकर आधुनिक काल तक के भारतीय इतिहास से ऐसे दर्जनों प्रमाण सामने रखे जिनमें जातीय सद्भाव और लचीलेपन का पता चलता है। अनेक यूरोपीय लेखकों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में जातियों में संघर्ष कराने का प्रयास गोवा में ईसाई पुर्तगाली शासन स्थापित होने का बाद प्रारंभ हुआ।

प्रसिद्ध लेखक तथा साहित्यकार राजीवरंजन प्रसाद ने शहरी नक्सलों तथा जातीय विद्वेष के गंठजोड़ पर प्रकाश डालते हुए महिषासुर तथा माँ दुर्गा की कथा को लेकर फैलाए जाने वाले भ्रमों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार समाज में संघर्ष पैदा करने के लिए ही कुछ लोग सक्रिय हैं। उदयपुर से आए इतिहास के विद्वान और वरिष्ठ पत्रकार विवेक भटनागर ने मुस्लिम काल में अस्पृश्यता के प्रारंभ होने की बात रखी तो गुआहाटी से आए शिक्षक तथा योगगुरु मधुकर रायचौधरी ने जातियों के आनुवांशिकी विज्ञान और भारतीय दर्शन के कर्मफल सिद्धांत के आधार पर जातीय व्यवस्था को समझाया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. नंदकिशोर गर्ग ने कहा कि यह ठीक बात है कि जातीय संघर्ष का कोई इतिहास नहीं मिलता, परंतु हमें आज की स्थितियों को भी ठीक करना होगा। उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के योगदान को याद करते हुए कहा कि अम्बेडकर ने भी यही कहा था कि उन्हें हिंदू धर्म से कोई शिकायत नहीं है, परंतु उन्हें कम से कम उस तालाब या कुँए से पानी पीने तो मिलना ही चाहिए जिनसे जानवर तक पानी पीते हैं।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ सेमीनार समाप्त हुआ।