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कालगणनाः एक भारतीय दृष्टि पर एकदिवसीय संगोष्ठी

नई दिल्ली स्थित भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में दिनांक 06 अप्रैल 2019 दिन शनिवार को सभ्यता अध्ययन केंद्र द्वारा ‘कालगणनाः एक भारतीय दृष्टि’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी की अध्यक्षता महाराजा अग्रसेन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. नन्द किशोर गर्ग ने की, जिसके प्रमुख वक्ता प्रसिद्ध अंतरिक्ष विज्ञानी डॉ. ओम प्रकाश पांडेय तथा भारतीय वेद विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. रवि प्रकाश आर्य रहे। इस गोष्ठी को और भी गरिमामयी बनाने के लिए यहाँ आईसीएचआर के सदस्य सचिव डॉ. रजनीश शुक्ल तथा राजनितिक विचारक गोपाल कृष्ण अग्रवाल विशिष्ट रूप से उपस्थिति रहे। संगोष्ठी का संचालन लोकसभा टीवी के संपादक श्री श्याम किशोर सहाय ने किया। संगोष्ठी के प्रारंभ में सभ्यता अध्ययन केंद्र के निदेशक रवि शंकर ने विषय की मौलिकता और विशिष्टता पर प्रकाश डाला तथा कुछ विशेष और व्यावहारिक प्रश्नों को पटल पर रखते हुए विशेष प्रवेश किया। रवि शंकर द्वारा पटल पर रखे गये प्रश्न कुछ इस प्रकार थे-

  • कालगणना पर चर्चा क्यों?
  • शुभ मुहूर्त कब, कैसे और क्यों? क्या इन झंझटों में पड़ना आवश्यक हैं?
  • पञ्चांग आध्यात्मिक या वैज्ञानिक? अगर वैज्ञानिक हैं तो इनका विज्ञान से किस प्रकार का सामंजस्य हैं?
  • कालगणना या काल की अवधारणा विज्ञान का विषय है या दर्शन का?

 

पहले प्रमुख वक्ता डॉ. रवि प्रकाश आर्य ने बेहद सरल तरीके से कालगणना के इतिहास और विज्ञान को समझाने का प्रयास किया। उनके तथ्यपूर्ण विश्लेषण में गजब काआकर्षण था, जिसने वहाँ उपस्थित श्रोतागणों को बांधकर रखा। उन्होंने अपने तर्कपूर्ण व्यक्तव्य में बताया कि साल 1536 ई. तक यूरोप को शून्य का ज्ञान ही नहीं था, जबकि हमारे भारतवर्ष में सबसे छोटी तथा वृहत्तर इकाई का सार्वजनिक ज्ञान था। इसीलिए हमारे मनीषियों ने दिन, सप्ताह तथा महीनों के नाम स्पष्ट रूप से प्रकृतिपरक और वैज्ञानिक आधार पर किये गए हैं। उदाहरण के लिए दिनों का आधार हमारे ग्रह हैं तो वहीं महीनों का मुख्य आधार चन्द्रमा है। इसी प्रकार सूर्य वर्ष का कारक है।

वक्ता ने बताया कि हमारी वैज्ञानिक तिथि प्रणाली के ह्रास का कारण विश्वभर का पूर्वाग्रहों से ग्रसित होना है। आज हमें अपनी ही तिथि निर्धारण कठिन लगाती है, इसका सबसे बड़ा कारण है उसका व्यव्हार रूप में कार्य न होना। मास परिवर्तन का कारक चन्द्रमा को बताते हुए उन्होंने कहा कि “अमावस्या के दिन चन्द्रमा और सूर्य के मध्य में जो कोण बनता हैं वो शून्य कोण होता है। इस प्रकार, शून्य से मास का पुनः प्रारम्भ माना जाता हैं। वैसे इस पर उत्तर भारत और दक्षिण भारत में मतांतर भी हैं, परन्तु उससे हमारी तिथि निर्धारण में कोई अंतर नहीं आता। कुछ वर्षो से मकर संक्रांति 14 जनवरी को न मनाकर 15 जनवरी को मनाया जाता है।

इस पर आगे उन्होंने बताया कि 72 (लगभग 71.6) वर्षों में पृथ्वी अपने स्थान से थोड़ी खिसक जाती है, जिसका प्रभाव हमारे पञ्चांग की तिथि निर्धारण पर भी पड़ता है। आगे 72 सालों के बाद पृथ्वी का यही परिवर्तनमकर संक्रांति को 14 जनवरी की जगह 15 जनवरी को मनाए जाने का कारक है, जो आगे 16 जनवरी भी हो जायेगा। डॉ. आर्य की माने तो “हम एक ही ढर्रे पर नहीं चलते, वरन् प्रकृति व नक्षत्रों की चालों पर परिवर्तन करते हैं। इस तरह से हमारी पद्धति यूरोप से कही अधिक वैज्ञानिक और श्रेष्ठ है।आंग्ल कैलेण्डर में समयानुसार सुविधानुकूल महीने जोड़े गए हैं। जबकि हमारे पास लाखों वर्षों का इतिहास का साक्ष्य उपलब्ध है। परन्तु पश्चिम के पास इसका पूर्णतया आभाव है। हमारी जीवन शैली में जन्म से लेकर मरण तक कालक्रम को व्यवस्थित और सुचारु बनाया गया है।आंग्ल कैलेण्डर को व्यक्ति अनुकूल बनाया गया है, जो इसकी अवैज्ञानिकता को सिद्ध करता है।”

इसी क्रम में उन्होंने आर्क बिशप (4000 साल पहले), जूलियस सीजर, ऑगस्टस के उदहारण भी दिए कि किस प्रकार इन्होंने अपनी सुविधानुसार और अपने सत्ताधीशों के नाम के आधार पर न सिर्फ महीनों के नाम बल्कि दिनों के नाम का भी निर्धारण कर दिया है। मज़े की बात तो यह है कि इनका कोई तार्किक विश्लेषण भी नहीं है, जबकि भारतीय पद्धति में मास, ऋतु और प्रकृति के अनुसार इनका निर्धारण किया गया है। चन्द्रमा की गति के अनुसार पाक्षिक अर्थात् अमावस्या और पूर्णिमा जो 15 दिन की कालावधि पर पड़ता है, में चन्द्रमा और सूर्य मिलकर 180 डिग्री का कोण बनाते हैं, वही अमावस्या में दोनों शून्य हो जाते हैं। उत्तरायण और दक्षिणायन की व्याख्या करते हुए उन्हें कर्क और मकर रेखा का अनुपालन करना होता है। कई बार मन में प्रश्न उठता है कि कभी-कभी एकादशी या पूर्णिमा या अन्य तिथियां दो दिनों की हो जाती हैं, तो कभी एक ही दिन में दो तिथियों का लोप हो जाता है। डॉ. आर्य ने इसका समाधान करते हुए बताया कि इसका कारण है हमारी तिथियों पर सूर्योदय का प्रभाव। चूँकि सूर्योदय प्रकाश को इंगित करता है। हमारे वेदो में भी इसकी विशद् चर्चा है। हमारा गायत्री मंत्र भी यही कहता है। इस प्रकार, जो तिथि सूर्योदय से सूर्यास्त के बाद हो वही मान्य होती है और सूर्यास्त के बाद की तिथियों का लोप हो जाता है। उन्होंने आगे बताया कि उत्तरी ध्रुव को सुमेरु तथा दक्षिणी ध्रुव को कुमेरु कहा गया है। वैसे भी हमारे यहाँ प्रत्येक आयोजन में तिथियों का बड़ा महत्व रहा है, यथा 12 वर्ष में लगने वाला कुंभ चूँकि वृहस्पति को अपना एक चक्कर पूरा करने में 12 वर्षा का समय लगता है। ऐसे में यही कारण है कि इस कालावधि में स्थान विशेष पर वायुमंडलीय प्रभाव के कारणगुणकारी अमृत बरसता है।

डॉ. आर्य के वक्तव्य के उपरांत अंतरिक्ष विज्ञानी डॉ. ओम प्रकाश पांडेय ने भास्कराचार्य कृत सिद्धांत का उद्धरण करते हुए अपना वक्तव्य शुरू किया और बताया कि पृथ्वी की एक लहर यानी कि वृत्तीय परिदि में उसका दोलन 25,771.4साल के अंतराल में होता है। इस बारे में उन्होंने लट्टू के घूर्णन का उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस प्रकार अगर हम लट्टू अपनी धुरी पर लहरदार घूर्णन करता है, ठीक वैसी ही गति पृथ्वी की भी है। इसके साथ ही डॉ. पांडेय ने पृथ्वी के निर्माण, उसकेअंत और उसकी अनेक गतिविधियों पर विधिवत प्रकाश डाला। काल की गणना का समय क्या हो, इस पर डॉ. पांडेय ने पश्चिम के वैज्ञानिकों की बिग बैंग के सिद्धांत को सृष्टि की पहली घटना मानने से इनकार करते हुए कहा कि जिस काल में बिग बैंग की घटना घट रही थी, उसके बारे में भी पता होना चाहिए। इसके अलावा जिस पिण्ड पर यह विस्फोट हुआ उसके निर्माण का काल भी कालगणना के अंतर्गत अध्ययन का विषय होना चाहिए और है भी, लेकिन पश्चिन के विद्वान इससे अछूते रहे।

आगे डॉ. पांडेय ने बताया कि चारो युगों की गणितीय गणना स्पष्ट है। इसमें कलयुग 4,32,000 वर्षों का है। फिर इसे 2 से गुणा करते हैं तो 8,64,000 वर्षों का द्वापर युग है। कलिकाल को 3 से गुणा करते हैं तो12,96,000 वर्षों का त्रेतायुग और जब कलियुग को 4 से गुणा करते हैं तो यह 17,28,000 वर्षों के सतयुग का निर्माण करता है। इस प्रकार, इन चारों का कुल योग 43,20,000 वर्षों को मिलाकर चतुर्युग का निर्माण करता है।

इसके आगे डॉ. पांडेय ने 13,20,000 वर्षों का एक मन्वन्तर,14 मन्वन्तरों का एक कल्प तथा 6 कल्पों का एक सृष्टि चक्र बताया। उन्होंने बताया कि 6 कल्पों कों भी उनके गुणों के आधार पर नामकरण किया गया है, जो इस प्रकार हैं-

  • ब्रह्मा
  • लोहित
  • पद्म
  • श्वेतवराह
  • पिंगल
  • कृष्ण

इसके अलावा उन्होंने विभिन्न मन्वन्तरों के नाम भी बतायें जो स्वयंभू, स्वरोचिष, उत्तम, तामस, चाक्षुष, रैवत, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसवरणी, धर्मसावर्णि, रूद्रसावर्णि, देवसावर्णि और इंद्रसावर्णि के नाम से परिचित हैं।डॉ. पाण्डेय ने आगे बताया कि किस प्रकार हमारे यहाँ समय को मापने के लिए प्राकृतिक घड़ियों का निर्माण हुआ था, जिसमे सबसे ज्यादा प्रचलित दो थे। एक तो रेत के द्वारा जो अभी भी कई जगह दृष्टिगोचर हो जाते हैं, दूसरा तांबे के दो बर्तनों द्वारा समय का मापन, जिसमें पानी के माध्यम से इसमें एक बड़े आकर का बर्तन लिया जाता था, जो पानी भरा होता था।छोटा पात्र खाली होता था, जिसमे एक छिद्र स प्रकार किया जाता था कि उसमेंबूँद-बूँद पानी जाता रहता था। इसके साथ ही उन्होंने हमारे 12 महीनो के शास्त्रीय नाम से भी लोगों का परिचय कराया, जो इस प्रकार हैं-

  • चैत्र – मधु
  • वैशाख – माधव
  • ज्येष्ठ – शुक्र
  • आषाढ़ – शुचि
  • श्रावण – नभस
  • भाद्र- नभस्य
  • आश्विन – ईश
  • कार्तिक – ऊर्ज
  • मार्गशीर्ष – सहर
  • पौष – सहस्य
  • माघ – तापस
  • फाल्गुन – तपस्य

इस प्रकार, कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष के दिन और रात में हमारे यहाँ अलग-अलग मुहूर्त होते हैं। डॉ. पाण्डे ने आगे संवत्सरो के विभिन्न नामों पर भी प्रकाश डाला और बताया कि इन्हें संवत्सर, परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सरएवं वत्सर के नाम से जानते हैं।

ब्रिटिश कैलेण्डर के जन्म के बारे में बताते हुए डॉ. पाण्डेय ने कहा कि आंग्ल कैलेण्डर को लेकर खुद यूरोप में एक मत नहीं है। इसका प्रादुर्भाव तो 1752 में किया गया, जिसमें पहले केवल 9 महीने ही होते थे। बाद में इसमें जूलियस सीज़र ने जुलाई जोड़ दिया और ऑगस्टस ने अगस्त। वहीं1752 में किंग जॉर्ज के नाम से जनवरी बन गया। लेकिन अभी भी वहां की परम्परा के अनुसार लंदन में 25 मार्च को ही नववर्ष मनाया जाता है, जिसमे वो अपने मिलने वालों को विभिन्न रंगो से भरी हुयी छोटी शीशियां भेंट किया करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने विश्व के विभिन्न देशों के कुछ उदहारण देकर बताया कि कहीं न कहीं हम एक ही सनातन संस्कृति से जुड़े हैं।

कालगणना की वैज्ञानिक अवधारणाओं पर प्रकाश डालने के बाद प्रश्नों पर चर्चाओं का दौर चला, जिसमे अनेक शंकाएँ प्रश्न के रूप में श्रोताओं ने दोनों वक्ताओं के सामने रखी। श्रोताओं की संपूर्ण शंकाओं और समस्याओं का समाधान दोनों विद्वानों ने किया और इस प्रकार ‘कालगणनाः एक भारतीय दृष्टि’ विषयक संगोष्ठी अपनी पूर्णता का प्राप्त हुयी।